सोमवार, 19 सितंबर 2016

तस्दीक 
भोलानाथ की एक फ़ोटो....व्हाट्सएप्प पर .. वायरल  हो गयी  थी .  ज़िंदगी
भरपूर जीने वाले  ललिता  राय उर्फ़ बाबू साहब  के हाई टेक  मोबाइल से क्लिक
होकर वह तस्वीर दस सेकेण्ड  के भीतर हंसी के छींटों  के साथ एक मोबाइल
सेट से दूसरे मोबाइल सेट पर वायरलेस घूमती उस दिन के मन-रंजन के लिए
पर्याप्त थी.... ..जहाँ भी पहुंचती हंसी छूटने की एक  ध्वनि होती ....और
लोग नाम पूछना शुरू करते . भाई ये है कौन” नाम भी तुरत पहुंचता  “अरे,अपने गाँव  कअ  भोलवा .... उधर से जवाब आता ... बहुत चूतिया है   साला
....”
 
    इधर  भोलानाथ को इतना भी याद  नहीं कि कब से बाबू साहेब के
यहाँ वे हलवाहा हैं. बाबू साहेब की  बीस बिगहा  की खेती  की  गोड़ाईं,बोआयीनिरायी,  फसल उगने-पकने से उसके खलिहान में पहुँचने तक में
भोलानाथ कहाँ-कहाँ   पिसे-छिपे  रहते हैं कि दिखायी नहीं देते हैं ....
कभी-कभी दिखाई देते हैं जब कोई उनको बुलाता है- ए सांपनाथ ..... कहाँ
रहले  हा बे .......तुम सबेरे से  देखाई  काहें नहीं  दिए बे ......” .भोलानाथ
 
के गहरे धंसे गाल लोटपोट हो  हंसने लगते हैं ...... अरे ए बाबूनाय
देखे   का  हम्मे ..... ..सबेरे से  तोहरे आँख के आगे  त  रहलीं  ह .....सबेरे   से त खेत में कटिया    करत रहलीं .हां....
          
बाबू  साहेब का कोई चमचा ,तब तक  खीस निपोरता
चला आता है जो बिना बात ही  बीच बचाव करता गाँव में अपनी खड़े होने की
जमीन पुख्ता करता है .. बोल पड़ता .. अरे नाहीं भय्या .. ई त  आज सबेरहीं
से काम में लागल हव्वुए... !  का  रे भोजन पानी लिहले .... ?.”
“.नाहीं बाबू अबहीं कहाँ...  सबेरे से त खेतवे  में लागल हईं .. दिन खराब
बा. जेतना जल्दी काम  होइ जाई ओतने नीक होई .. नाहीं त बड़ी बर्बादी होई ए
बाबू . ..” 
     
बाबू साहेब के दांतों में और उन का पान ढोने वाले सिवरमवा के
दांतों के कत्थयी-कालेपन में कोई फर्क नहीं है .फर्क है तो  दोनों के
कुर्तों  के रंग-ढंग  में ...... बाबू साहेब का झकास है,कपड़े का मटीरियल
भी  नफीस है ......उसका कुछ सफेदाह मगर पीला ....
     पान का एक बीड़ा बाबू  साहेब को तो दूसरा अपने मुंह में चांपते
शिवराम,  बाबू साहेब के बगल में खड़े होने के चक्कर में अपनी रीढ़ से इतना
खेल गए हैं कि वह पीछे से भोथरा( बिना धार का )   हंसुआ हो गयी है . पेट और पीठ में जैसे धंसने की होड़ लगी है ..  शिवराम भोलानाथ को लुहकारते हैं ...”.भाग सारे,जो पहिले खाइ के आवअ .... मरि जयिहें ससुर ....!
       जात हईं .. बाबू ... ... भोलानाथ गदगदा के खाने चले जाते हैं....
भोलानाथ धरती के घूमने के साथरात-दिन होने के साथचलते हैं ...अपनी
टुटही खटिया से उठते हैं तब से लेकर अन्धकार आने तक अपने पैरों पर खड़े
रहते हैं और रात जाकर बंसखट पर अपने दोनों पैर लिटा देते हैं .. इसी
हाड़तोड़  दिनचर्या में पांच बच्चे उनकी मेहरारू ने जने हैं.. किसी चीज का
स्वाद नहीं जानतीं हैं लेकिन फिर भी वो  चरफर है ....बाबू हैं न ..
पाँचों पल जइहें .  भोलानाथ की मेहरारू यह सुनकर भरोसे के  चैन में  जीती
 
हैं ..भोलानाथ मेहरारू से अक्सर बाबू साहेब का बखान करते हैं – “बाबू
अच्छे हैं .इतनी बड़ी जिनगी में कब्बो  हाथ  नाहीं उठाये   हमरे प ..
तोहरी   ओर भी आँख उठाके  नाइ  देखलें  .. भौजायी कहे लेन ” ...
        बाबू साहेब पूछते रहते हैं –“का रे ... कौनो दुःख कष्ट त नाईं बा
.... 
लरिके फरिके सब ठीक हव्वें न ..”   “ हाँ बाबू .. आपके दया से कुल
ठीक  बा .. "
"
त अब बड़का   क उमर  दस साल  भइल न  ! "त  ओहके भेज . अब . खेते में . ...."
भोलानाथ खीस निपोर देते हैं .... ए बाबू मलकिनिया कहति  है कि  लरिकवन के पढाइब "
 .....”
“ ससुर   तू  पगलाइल  हव्  का ...? .का करिहें   पढ़ि के ...? . घसिये न
छिलिहें  ...”
“ हाँ  बाबू  अउर  का ...
तब्ब ...?”
 बाबू  एक बड़ा सा बौद्धिक  प्रश्न भोलानाथ के सामने छोड़ कर चल देते हैं.
.... 
भोलानाथ  बाबू का बहुत सम्मान करते हैं . बाबू  कभी उसको गलत राय
नहीं देंगे  .. आज  वह जी रहा है तो  बाबू  साहेब ही इसका  कारण  हैं
....
हम जिनगी दे के भी उनके एहसान से उरिन  नहीं होंगे ......
 भोलानाथ की एक ही कमजोरी है – ठर्रा..  ठर्रा  दे के जो चाहे  काम करा
ले  कोई .... बाबू साहेब कभी कभी चिल्लाते हैं .. ए भोला  मरि जइब  ससुर
...
देखअ कइसन    हड़हड़ाइल  हव्वे ... हे गिरीस सुनअ.. तनि.  इधर  सुनअ अ  ....इनकर एक-एक ठो
पसली गिन डारा     ... देखा  एक्को ढेर त नाइ बा ..” पूरी जमात इस
चुटकुले पर ठहाका मार  हंस देती है ......भोलानाथ सबके आकर्षण का केंद्र
बने पसली गिनवा लेते हैं ... नाइ कक्का ... बारह एह तरफ  आउर बारह वह  तरफ ”...
इहो ससुर क नाती गिनती नाइ जानेलें . सब लोग फिर मुस्की मार देते हैं
    ..भोलानाथ जानते हैं कि ... बाबू हुल्साते हैं तब   खुद ही पिलाते
हैं ....वह भी अंग्रेजी ....अंग्रेजी बोतल खोलने में भोलानाथ को जो सुख
मिलता है और अंग्रेजी का  जो सुआद मिलता है ....तो उस दिन  भोलानाथ ...
मदमस्त होकर सोते हैं ....”   भोलानाथ ... आज काम  बहुत  बा......तोहार
अंग्रेजी हमारे पास  रक्खल बा ...” भोलानाथ दुगुने जोश में भर उठते हैं और दस आदमी
का काम अकेले करते हैं .......इधर बाबू एक हरकारे को  बुलाकर अपनी ब्लैक
डॉग की बोतल मंगाते हैं जिसमे रात की तलछट वाली  शराब बची  है...".आधा
बोतल पानी  भर बे एह में ......”   शराब का धोखा देती .बोतल सामने रख गयी
है ..... भोलानाथ को बुलाकर दिखा दी गयी है... भोलानाथ  गाँव लांघती,बस्साहट के साथ चारों ओर  पसरती नाली  की सफायी में लगा दिए गए हैं ..
भोलानाथ अकेले जुटे हैं.  सावन  भांदों के पहले नाली साफ़ हो जाए नहीं तो
गाँव भर की दुर्गति है..
 
जेठ  के ताप का होश नहीं है उन्हें .अंग्रेजी जो रखी है .. भोलानाथ की  पटरा की जन्घियाँ का पटरा-डिजाइन पता नहीं कब का रंग छोड़ चुका है.  सूत भी जलिया गया है और उसके बाद जलियाना भी ख़तम होके  जांघिया का नाड़ा बचा है और  दोनों टांगों को अलग करने वाली मियानी बची है. उनकी कोंनदार हड्डियों वाले चूतड़ों का कपड़ा पूरी तरह उड़ गया है.अंग्रेजी के कारण जोश में आ जाने पर  अपनी लज्जा को ढंक  रखने वाली,बेरंग फटही लुंगी उन्होंने उतार फेंकी है ... उनके दोनों चूतड हर ओर से
उघडे हैं और वे नाली के ऊपर पूरी तरह से  झुके दुनिया की हर मुश्किल से
निफिक्र  तल्लीन हैं नाली का सारा कचराबदबूकरिया पानीकिचड़ामिट्टी
सब उधिया कर निकाल फेंकने में ....वे भूल गए हैं कि उनको भूख-प्यास लगती
है कि उनकी मलकिनी  खाना लिए उनको धिक्कारती अगोर रहीं हैं ... ..और तभी
बाबू साहेब टहलते हुए उधर आ जाते  हैं . उनका हाई टेक मोबाइल तीन बार
क्लिक होता है . दोनों बार दो एंगिल से और एक बार फ्रंट से  ... हँसी
छूटने की जोरदार ध्वनि होती है पर भोलानाथ को होश नहीं है. ...... बाबू
साहेब  सबको हँसी पर काबू पाने के लिए हिदायत दे रहे हैं ... अब्बे देखि
लेई त .  .. डिस्टर्ब होइ  जाई . पूरा नाली  साफ़ होइ  जाए द  पहिले.........
        सब लोग चुप हो गए हैं पर तब तक फ़ोटो.... वायरल हो गयी है ..
व्हाट्स एप्प के कई ग्रुपों में...  उधर से हँसी के छूटते फव्वारों की
उछल कूद ..  हँसी की  गिलहरियाँ के  लोटपोट होकर टेढ़े-मेढे होते ...
.
आकार  हंसी की आवाज़ की जगह पर  चले आ रहे हैं ....." ये है कौन ..?.. भोलवा ..... मुंह नाइ  देखाई दी त कईसे केहू
चिन्ह  पाई   .और हवा में लहराते ठहाके  ... फ़ोन कॉल्स भी बाबू साहेब के पास आ
रहीं  है-कौन है ई
.”भोला   आपन  भोलवा ..आज भोला को सब लोग जान गए हैं .
शाम हो गयी . भोलानाथ ने  हाड़ गला कर नाली साफ़ कर दी .. ... ए भोलानाथ
.. 
नहा के अंग्रेजी के नजदीक  अयिहा..... बस्सात  हवा...  मरदे .....शिवराम बोला ... भोलानाथ नहा धोकर बोतल के पास आये. लेकर चले गए .. पीकर
मस्त सोये .
     
उनकी तस्वीर  .. व्हाट्सएप्प  पर घूमती रही ..  तीसरे दिन
फिर लौटकर  बाबू साहेब के मोबाइल पर फिर चमकी .....बाबू साहेब एंड पार्टी
 
एक बार  फिर हँसी ....  .. भोलानाथ ...   भोलानाथ .... सुन अ   जल्दी .. ......” 
भोलानाथ भागते हुए आये .....बाबू साहेब ने अपने  मोबाइल का
स्क्रीन  भोलानाथ  के सामने चमका दिया ...”.ई का हा   बाबू .....
“ पहचान ....
“.नाइ पहिचानत  हईं     बाबू .... 
आपन चूतर .. नाईं  पहिचानत  हवा और आपन घंटियो नाइ पहिचानत  हवा ? “
सब लोग ठठाकर हंस पड़े .. भोलानाथ एकदम हकबका गए .. मारे लाज के अपनी
हथेलियों से अपना चेहरा ढकने लगे ..” ए बाबू .. ई कइसे भइल .. ए बाबू ..
मिटा द एके ...  ए बाबू .....
 “अब का ..ई त  दिल्ली भरे क लोग देख लिहलें ....
    भोला नाथ अपना चेहरा छिपाए जमीन में गड़ गए .. ए बाबू .... आज ले
हमार मेहराऊ हम्मे नंगे नाइ देखलस  .. ए बाबूए के  मिटा द  हो . ए.बाबू ..
नाईं  बाबू हमार लरिका देखि लीहें   त केतना खराब लगी .. का  कहिहें .. ए
बाबू . 
“ बड़का तूं लजाधुर भईल  हव्व ...”  शिवराम उधर से बोला ..
ए बाबू सहिये हम बड़अ लजाधुर हईं ..एहके मिटा द  हम कब्बो  तुहँसे
अंग्रेजी नाईं मांगब ... ए बाबू.. ..
“.भाग सारे ....भाग ..
“ नाईं  ए बाबू .. हम भगवानो  जो आय  जयिहें    तबो  आज  इहाँ से नाई  जायिब ....एहके
मिटावअ तूं.
  लोग ... भोलानाथ...की हर गिड़गिड़ाहट  पर हंस के लोटपोट हो रहे हैं ..
भोलानाथ के ऊपर बेहोशी छाने लगी है ...भोलानाथ उकडू बैठे-बैठे गिर गए हैं
.. 
बाबू साहेब ने दौड़कर आये  देखा तो नाड़ी बंद है  .. भोलानाथ .. ए
भोलानाथ...उनके मुंह पर  पानी के छींटे दिए गए पर भोलानाथ पर किसी  चीज
का कोई असर नहीं हुआ ... ...
     उस दिन गाँव के  सब लोगों को  पता चला कि भोलानाथ बहुत लजाधुर थे .
उनकी पत्नी ने रोते-रोते इसकी तस्दीक  की .

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

जीने से पहले 
           
सांझ का झुटपुटा था. गांव के पश्चिमी  कोने के पीपल की सबसे
ऊंची फुनगी से उतरकर सूरज पोखरे की ओट जा रहा था. पोखरे के पानी में
उसकी किरणें ऐसे उतर रही थीं जैसे दिनभर की थकी-हारी निरुद्देश्य वे वहीँ जाकर
डूब मरेंगी. अंधेरा बस छाने ही वाला था. मनीषा और मैं दोनों तेज़ कदमों
से जल्दी-जल्दी बगीचे से घर की ओर लौट रहे थे. तभी मैं जोर से चिल्लाई
-"
वो देखो सुखना बो."
           
मनीषा मेरे चिल्लाने पर एकबारगी चौंक गई और अगले ही पल  उसने
मेरी बेवकूफी भरी हरकत पर मुझे जोर से एक  धक्का दे दिया. मैं गिरते-
गिरते बची थी. दरअसल मुझे गलतफहमी हुई थी. मेरे बगल से एकदम सटती हुई कोई
औरत निकली थी जो कद-काठी में हूबहू सुखना बो जैसी थी. आप सोच रहे होंगे
ये सुखना बो कौन है जो मेरे मन पर इस क़दर छाई हुई है कि किसी भी साए में
दिखाई देती है.
                             
क्या बताऊं मैं...! वैसे सच तो ये है कि
मैं सुखना बो को खुद भी ठीक से नहीं जानती. किसी इंसान को जान पाना आसान
होता है क्या, वो भी एक औरत. ज़िन्दगी और मौत के छोटे-छोटे एहसासों के
बीच बार-बार जीने-मरने से अजीब पहेली बन जाती है वह. कब वह नदी होती है
और कब ठहरा हुआ तालाब का पानी, कब वह सितारों में चलती है और कब कुएं के
भीतर रास्ता तलाशने लगती है- यह सब कुछ वह जानकर भी नहीं जान पाती है.
अंधेरे हों या उजाले दोनों ही उससे आंखमिचौनी खेलते हैं और वह ज़िंदगी के
हंसोड़ होने का भ्रम पाले रहती है.
                     
मां के साथ मैं गर्मियों में ननिहाल गई हुई थी.
अंधेरा ढलने के बाद घर की लड़कियों- औरतों का घर से बाहर होना यहां
परिवार की परम्परा के बेहद खिलाफ था. उस समय तो मनीषा और मैं बस इतना ही
जान रहे थे कि घर पहंचने में जो थोड़ी भी देर हो जाएगी तो हमारी बहुत
कुटम्मस होगी. मनीषा डरती थी मेरी मामी से और मैं उसकी बुआ से. हम दोनों
ममेरी-फुफेरी बहनें थीं लेकिन उससे भी पहले मनीषा मेरी पक्की सहेली थी.
हम दोनों एक-दूसरे का जूठा  खा लेते, कपड़ों की अदला-बदली करते,
कच्ची-पकी इमलियों को आपस में बांटते, रोमांचित और भयभीत होने पर
एक-दूसरे का हाथ पकड़ लेते... और इसी तरह बड़े होते गए  .
                 
मुझे वह ढलती सांझ बहुत भा रही थी. आसमान का एक पूरा
कोना बहुत लाल था और पेड़ों की फुनगी की हरी-हरी पत्तियां ललछौंह हो गई
थीं. चारों ओर फैली उस लाली में रोमांच के अलावा दूर-दूर तक अगर कुछ था
तो वे थीं हमारे तेज़ कदमों की ऊबड़खाबड़ आवाजें. हम लगभग दौड़ रहे थे.
मेरा दम फूल रहा था. फिर भी सुखना बो चौड़ी मांग भरे और छपेली साड़ी पहने
बार-बार नज़र के सामने आ रही थी. मुझे लगा कि अगर वह इस दुनिया में थी तो
जरूर आज वह भी मुझे याद कर रही होगी या यह केवल मेरे मन का स्वप्न था.
                         
मुझे चार-पांच वर्ष पुरानी अपने बचपन के उस
दिन की वह घटना अनायास याद हो आई और मैंने मनीषा से पूछ ही लिया- "ए
मनीषा, उस दिन सुखना बो इतना किसलिए रो रही थी जिस दिन नाना तेजवा को
मारने उठे थे. तुमको याद है न...और अम्मा और मामी उस समय किसलिए सुखना बो
को इतना ढाढ़स दे रही थीं. मुझे लगता है कि उस दिन कुछ बात तो जरूर थी."
       
फिर से सुखना बो की बात छेड़ देने पर मनीषा ने कुछ झल्लाकर कहा,
"
तुम भी न गड़े मुर्दे उखाड़ने में जुटी रहती हो. आज उसकी इतनी
याद क्यों आ रही है तुम्हें. अभी कुछ न पूछो... मैं तो अब घर पहुंचकर ही
दम लूंगी, नहीं तो आज तुम फुआ से फिर पिटोगी." उसने ताना मारते हुए कहा.
उसके इस तरह झल्लाने पर मैं चुप रह गई थी और उसको हमेशा की तरह अधिक
समझदार मानते हुए अपनी चाल तेज़ कर दी थी.
                           
घर की देहरी से भीतर आते ही हम दालान के घने
अंधेरे को पार कर बड़े आंगन में पहुंचे. आंगन के चारों ओर बने खमिया
अंधेरे में डूबे हुए थे. पूरब वाली खमिया में एक बल्ब ढिबरी की तरह
टिमटिमा रहा था. हर ओर मद्धिम अंधेरे का राज पसरा था, फिर भी बड़े-बड़े
चौकोर पत्थरों से बने पुराने ढंग के उस आंगन में चारखानी आकृतियां अपने
पथरीलेपन के साथ चांदनी रात में और उभर रही थीं. सिलबट्टे की खटर-पटर उस
दो-चार प्राणियों वाले घर में जीवंत थी. मामी रसोयईवाले बरामदे के एक
कोने में मसाला पीस रही थीं और चूल्हा मद्धिम सुलग रहा था. बटलोई में दाल
खदबदा रही थी. मां चूल्हे के पास बैठी थी. मुझे शादी-ब्याह के समय खचाखच
भरा रहने वाला वह मेले जैसा आंगन याद आ रहा था जब एक चारपाई बिछाने के
लिए भी जगह खोजनी पड़ती थी और सुखना बो मेरे लिए जगह रोके मेरा इंतज़ार
करती थी. पहुंचते ही चहकती थी- "साम्हारा बबुनी अब हम जात हईं..."
दालान की ऊंची चौखट पार कर हम हाथ-पांव धोने बखरी के अंधेरे की ओर चल
दिए. गलियारा पार करने के बाद अंधेरे में आंखें दिप-दिप जल रही थीं.
सुखना बो के ख्यालों में डूबी हुई मैं बोली- "इतनी कम रोशनी में मुझे कुछ
भी दिखाई नहीं देता है. शायद अब अंधेरे में भी देखने की आदत डालनी होगी."
               
पचीस वाट का एक बल्ब अकेले ही बखरी के विशाल अंधेरे से
लड़ता रहता था. उतने बड़े उस घर में बखरी में एकमात्र हैण्डपम्प था जो
छूते ही बेसुर में ही सही मीठे पानी का सोता था. वह बखरी घर की स्त्रियों
के नहाने-धोने के लिए इस्तेमाल होती थी. वहां किसी भी पुरुष का प्रवेश
सर्वथा वर्जित था.
         
आंगन से बखरी की ओर जाने के बीच जो गलियारा था वह दो कमरों की
दीवार के बीचोबीच खुद-ब-खुद बन गया था. उस गलियारे में पहुंचते ही अनाजघर
से अनाजों की मिली-जुली सोंधी खुशबू आती थी जिसमें धूल की महक ऐसे सनी
होती थी जैसे कीचड़ में पानी. जिस कमरे में मेरा जन्म हुआ था उस कमरे की
दीवार उस गलियारे से लगी हुई थी. वहां पहुंचते ही मैं सुकून से भर उठती
थी. दिन के उजाले में सुखना बो का घर बखरी में बने लोहे की छड़ वाले
जंगले से साफ़ दिखाई देता था. वह गलियारा मेरा और मनीषा का अड्डा था जहां
हम दोनों मां और मामी की हिदायतों से बच कर दुनिया जहान की झुरमुटी
हरियालियों में खो जाते थे.
               
मैं सुखना बो के कटे-फटे मन पर लगे पैबन्दों की गवाह
थी. लेकिन अदभुत था तो उसका रूप जहां उसके दुखों की पूर्ण अनुपस्थिति थी
जैसे सूर्योदय के बाद अंधेरे की. ननिहाल पहुंच मेरी आंखें सबसे पहले उसकी
ही खोजखबर लेती थीं. उसकी लाल-पीली छपेली साड़ी, माथे पर टिकुली, टटकी
भरी हुई मांग, सफ़ेद चौड़े दांत, हल्दी में दूध-केसर मिला गोरा रंग और
उतनी ही चौड़ी उसकी हंसी. सब कुछ बहुत रिझाता था मुझे. उस बार भी जब मैं
गांव पहुंची और थोड़ी देर तक सुखना बो नहीं दिखाई दी तो मैं मामी से पूछ
बैठी- "मामी सुखना बो कहां है?"
   "
वह तो कहीं गायब हो गई!" मनीषा पहले ही बोल पडी.
   "
कहां?"
   
लेकिन तब तक मामी ने मनीषा को डपट कर चुप करा दिया था. मां की चुप्पी
से मुझे लगा कि शायद मां को पहले से मालूम था. उसने मुझे क्यों नहीं
बताया था, यह पूछकर मैं भी मनीषा की तरह डांट नहीं खाना चाहती थी. थोड़ी
ही देर में मैं और मनीषा उसी सुरक्षित गलियारे में पहुच गए.
"
वह कहां चली गयी मनीषा?" मैंने पूछा.
"
मुझे तो डाउट लगता है कि तेजवा ने ही कुछ इधर-उधर कर दिया है." मनीषा बोली.
"
वही तेजवा जो नाना के पास रहता था मजूरी के लिए?"
"
हां वही जो दक्खिन टोले का है...लम्बा-तगड़ा भूत जैसा. सुखना बो अम्मा
से कहती थी कि वह उसको खेत-खलिहान में भोर, दुपहरिया, सांझ, रात जब भी
मिल जाता था बहुत तंग करता था. जब वह सबेरे बरसीम काटने निकलती थी और
खांची मेड़ पर रखती थी तो तेजवा उसकी खांची लेकर खेत में चला जाता था कि
वह खेत में जब खांची लेने के लिए तेजवा के पीछे आए तो..."
अचानक मनीषा बोलते-बोलते रुक गई. मैंने उत्सुकता में पूछा -'आए तो...?
मनीषा  खनखना के हंसी और बोली, "एकदम पगली हो, खेत में ही पकड़ के मौज
करने के लिए और क्या!"
"
अरे बाप रे ऐसा भी होता है क्या..."
"
लो होता क्या नहीं है यहां. खुद को न बचाओ तो इन हरे-भरे खेतों में क्या
न हो जाए. सुखना बो कितनी ही बार खांची छोड़कर बिना घास लिए ही लौट आई
है. " वह फिर थोड़ा रुक कर बोली, "लेकिन इन बातों की किसी को कानोकान खबर
नहीं होने पाती. बस दो-चार औरतें आपस में फुसफुसाकर चाहे जितनी बात कर
लें घर के मर्द तक बात नहीं जाती."
"
क्यों?"
"
फसाद कौन कराए. मारी तो आखिर औरत ही जाएगी न." मनीषा शांत पानी के नीचे
का हालचाल अक्सर यूं ही बयां कर देती थी .
"
लेकिन `एक बात जानती हों..."
"
क्या?"
"
फंसी तो वह तेजवा से ही थी...."
मैं चौंक गई और उसकी बात काट कर बोली- "अच्छा बताओ, अगर उसका चक्कर तेजवा
से था तो इस बाबत वह उस दिन मामी से उसके बारे में भौहें चढ़ाकर इतनी
शिकायत क्यों करती कि जैसे उसे तेजवा मिल जाए तो उसे कच्चा ही खा जाएगी."
मनीषा को अपनी कही बात पर वैसे ही ऐतबार रहता था जैसे बनिए को अपनी तौल
पर होता है. बेहद बेफिक्री से बोली, "ये मुझे  नहीं मालूम मगर जो मैं बता
रही हूं वह राई रत्ती सच है."
   
तब तक  मामी ने आवाज़ लगाई और हम दोनों उठकर चल दिए. मामी के
छोटे-छोटे घरेलू काम मैं और मनीषा ही निपटाते थे. सबेरे ही सुहाग की पूजा
के लिए जब हम लोग मां की बचपन की सहेली मनु मौसी को बुलाने उनके घर जा
रहे थे तब मनीषा ने अचानक मुझे रोक लिया.
        "
देखो यही तो है वह कुआं जिसमें सुखना बो अपनी सास से गुसियाई
हुई खीझकर कूदी थी."
 "
अच्छा!" मैंने अचरज जताया तो वह बोली, "सास-ननद से झगड़कर और आदमी से
मार खाकर औरतें इसी कुएं में तो आकर कूदती हैं, इसमें पानी नहीं है ना!"
वह हंसने लगी.
 
उसकी यही आदत मुझे अच्छी नहीं लगती थी. कितनी खीज और क्रोध में भरकर किस
मजबूरी में वे औरतें ऐसा करती होंगी यह मनीषा नहीं समझती.
             
मैंने झांक कर देखा. पानी तो था नहीं उसमें, लेकिन खरपतवार
से पटा होने के बाद भी उसकी गहराई कम नहीं थी.  कुएं की पुरानी दीवार से
फूटते पेड़ों की जड़ें पतली शाखाओं के रूप में फैली हुई थीं.

"
सांप बिच्छू  क्या कम होंगे इसमें . एक अजगर भी तो यहीँ कही रहता है मनीषा,
 सुना है कि  बहुत पुराना है एकदम काला   ." अरे ..छोड़ उसे इस गाँव में बड़े बड़े अजगर हैं जो मैं बता रही हूँ वह सुन". 
उसने मेरा हाथ पकड़ लिया
मनीषा ने बताया- "गांव के मनचले सुखना बो को बहुत चिढ़ाते थे कि भौजी
तुम्हारा पेटीकोट उठ  गया था जब तुम कुएं में गिरी थीं...तुमको कुछ होश
है कि नहीं." मनीषा ने बताया कि यही वो बात है कि सुखना बो का नाम आते ही
गांव भर के रसिक मर्द क्यों मुस्कराने लगते हैं और औरतें आंचल में चेहरा
छुपाकर क्यों हंसती हैं.

                 
मनीषा को गांव भर का बहुत कुछ मालूम था, कि किसको
किससे गर्भ ठहरा, कौन किससे साथ किसकी कोठरी में कौन-सा गुनाह करते पकड़ा
गया.  किसकी चिट्ठी का कौन डाकिया है. टिकोरा लेने के लिए घरनू बढ़ई की
चौदह साल की अधपगली बेटी किस तरह चरन मास्टर के बेटे के साथ दुपहरिया
बिताकर आई और घरनू बढ़ई ने फिर उसको किस तरह मारा कि तीन दिन हल्दी-प्याज
बांधे घर में पड़ी रही. कभी-कभी मुझे उसकी बताई बातें एक रहस्य की तरह
लगतीं. क्या उसे लगता था कि मैं उसकी बातों में कहानी का रस ढूंढ़ती हूं
इसलिए वो बातों की कहानी बनाती थी?
.
वो एक सफल किस्सागो थी, और मैं एक उत्सुक श्रोता थी.
 
मेरी बांह पर पतलो  से    चीरा लगा और खून बह आया. ऐसे
झाड़-झंखाड़ के रास्ते जाने क्यों ले आती है मनीषा.
     
 
सुखना बो के कुएं में जा कूदने वाली  मसालेदार  चर्चा में  उसके आंसुओं से किसी को कोई लेना देना नहीं था वैसे ही जैसे अनपढ़ को अक्षरों से नहीं होता  . यह बात हर  संवेदना  से  परे होकर बालक से किशोर होते लड़कों 
तक ऐसे पहुँचती जैसे पुरुषोचित आन बान  बिना सिखाये रक्त में बहती है.
               
टोले के लड़के जब जुटते और सुखना बो जो दो गली छोड़कर भी
निकले तो ख़ास किस्म के ठहाकों की गूंज सुखना बो के होने को पूरनमासी के
मेले में बिकने वाले खिलौना बना डालती. कुएं वाली घटना के बाद अपने जीवित
बचे रहने पर वह बहुत पछताती थी और बार-बार गांव के दक्खिन बने ताल के
किनारे जा पहुंचती थी लेकिन जीवन के प्रति मोह का कोई अदृश्य तंतु उसे
फिर वापस ले आता था. मुझे लगता था कि ऐसे मौकों पर जरूर उसे द्रौपदी का
चीरहरण याद आता होगा और दुर्योधन का अपनी जांघों पर हाथ फेरना.
                         
मनीषा ने बताया कि सुखना बो उस दिन इन्हीं
बातों को लेकर रों रही थी और मामी और मां उसको ढाढ़स दे रही थीं. फिर
उसने मुझे ताना दिया, "देखना कहीं तुम न रोने लगना."
सुखना बो की जिन्दगी का सूत-सूत कातते हुए मनीषा बोली, "उस मैदे की लोई
का उस काले-कलूटे बदसूरत सुखना से भला कोई मेल था!  ऊपर से जानती हो कि
उम्र में वह कितनी छोटी थी सुखना से?.....खुद ही देख लो कि सुखना की कमर
झुक गयी है...जबकि अभी पांच ही महीने तो हुए उसे गायब हुए. खुद ही अंदाज
लगा लो उसकी उम्र का."
"
कहां गई वह?" मैं अधीर थी.
"
मुझे क्या पता... मुझे तो बस यह याद है कि जब वह एकदम जवान थी यह तब भी
इतना ही बूढा था."
   
मुझे याद आया वह जेठ की दुपहरिया थी और उस बड़े से घर के बड़े से
आंगन में सांय-सांय सन्नाटा था. जिस कोने में छांह थी सुखना बो के साथ
मैं वहीँ बैठी थी. मेरे पांवों में अजनबी-सा दर्द था. उसने मेरे पांव
धोये और मालिश के लिए तेल लेकर बैठ गई. मुझे मालूम था कि उसके दर्दों के
आगे मेरे पैर का दर्द तो कुछ भी नहीं था. वह केले के पत्ते-सी फटी हुई
थी, फिर भी मैंने उससे पूछ  ही लिया, "ए सुखना बो, सुखना तुमसे उम्र में
इतना बड़ा है तो तुमने शादी क्यों कर ली उससे... बोलो?"
 
सुखना बो ऐसे चुप हो गई जैसे काठ की हो. उसका चेहरा देख मुझे लगा कि
मैंने पूछ कर कोई बड़ी गलती कर दी है. मेरा सवाल बहुत स्पष्ट था...शायद
बहुत उघड़ा हुआ, पर जाने क्यों मुझमें जैसे जवाब पाने की जिद आ गयी थी,
"
बोलो न,  तुम्हारी मां को पसंद था क्या सुखना... या कि तुमको?"
सिर झुकाए रही सुखना बो! फिर आंखें नीची किए ही बोली, "बाप थे नहीं
हमारे.  माई निपट अकेली थी तो खाली रोती थी! उसको हमारे ब्याह की बड़ी
चिंता थी. एक भाई था तो वह तो और भी नासमझ था."
 "
पिता को क्या हो गया था?"
"
हारी बीमारी तो लगी ही रहती थी उनको बबुनी,  देह से बहुत कमज़ोर हो गए
थे.  हमारी शादी से साल भर पहले ही एक रात अचानक ख़त्म हों गए." इतना
कहकर वह सिर झुकाकर पांव दबाती रही. मैं चुप रही.
थिर बैठी वह वह फिर बोल पडी, "माई को किसी भी तरह से हमारी शादी करनी थी.
लड़की को खाना-कपड़ा मिले इतना ही देखा बस और कुछ न माई ने देखा  न वह
जानती ही थी."
"
क्या उम्र थी तुम्हारी तब सुखना बो?"
       
उसकी छतरीली पलकें बादल बन गईं और आंखें डबडबाई घटा, जिनसे मैं
भीग गई. उस चुप बंजर दोपहर में हमारे बीच अनकही आत्मीयता का फूल खिल गया
था. जैसे तितली के पंखो को छूने पर उनके रंग उंगलियों में उतर आते हैं
उसी तरह का कुछ. फिर जब भी वह घर में आती थी एक नज़र मुझको जरूर देखती
थी. "का हो बबुनी".... मैं उत्तर में सिर्फ मुस्करा देती. उसकी बड़ी-बड़ी
आंखों में काजल की सधी हुई पतली धार होती, जैसे म्यान में काले रंग की
कोई अनोखी तलवार हो. मुझे उसकी निरीहता में उसकी खुद्दारी की एक झलक दिखाई
देती.

             
उससे दोस्ती होने के बाद एक सांझ घूमते-घामते मैं और मनीषा
उसके घर उससे मिलने गईं. उस दिन वह मामी के पास नहीं आई थी...पर यह तो एक
बहाना था. मुझे तो सुखना को देखना था. गांव में पक्के खड़ंजे से लगकर एक
चौड़ी नाली जाती है. उसी खड़ंजे से लगी हुई सुखना बो की फूस की एक
छोटी-सी झोंपड़ी थी. अन्दर मिट्टी की दीवारों पर खड़े दो कमरे, दुआर पर
बंधी एक गाय, गाय की हौदी और हौदी में पड़ा हरा चारा, जिसके लिए सुखना बो
अपनी ज़िंदगी को मरुस्थल बनाए रहती थी और इस खेत से उस खेत हरियाली खोजती
रहती. हम दोनों को देखते ही एकदम खिल गई, "आव बबुनी आव!"
                                 
उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में ममता उतर आई
थी. जल्दी से गुड़-पानी लेकर आ गई और हमारे लिए खटिया बिछा खुद जमीन पर
बैठ गई. इतनी आवभगत. मनीषा ने जल्दी जाने की जिद न पकड़ ली होती तो वह
भला मुझे आने देती.  उसी रोज मैंने सुखना को देखा था. सामने से टूटे दो
दांत और सफेद बालों वाला वह सच में उसका पिता ही लग रहा था.


 
औरतें बहाव की उलटी धारा में पतवार डाल नहीं उतरतीं, लेकिन सुखना बो
कुछ अलग थी. बार-बार की चोट के बाद भी उसमें अपने वजूद की एक जिद थी. इसी
जिद के जरिए वह अपनी पीड़ाओं से जूझती थी. यह जिद उसका प्रतिरोध थी. कोई
बात बुरी लग जाए तो बगैर खाए-पिए कितने ही दिन गुजार देती थी. बात-बात पर
रूठती थी. शायद खुद से नाराज़ रहती थी या फिर कौन जाने इस दुनिया से ही
नाराज़ थी वह. फिर भी सघन बंसवारी की तरह आकर्षक और रहस्यमय थी. तभी तो
सबसे अलग नज़र आती थी.  एक दिन उसकी डबाडब आंखें देखीं तो मैंने पूछा,
"
अरे क्या हुआ..."
वह गुस्से में थी. बोली, "देखो आज बूढा ने कितना बड़ा इलज़ाम लगा दिया
हमपर." वो अपनी सास को बूढ़ा कहती थी. बोली, "कहती हैं कि कूड़े में रखा
सारा गुड़ क्या हुआ. जब हमने कहा कि हम क्या जानें तो कहतीं हैं कि तुम
ही खा गई हो सब." वह तमतमाई हुई थी. उसका आत्मअभिमान कुचले हुए फन-सा था.
बोली, "बबुनी हम क्यों खाएं उनका गुड़...हमें तो गुड़ पसंद ही नहीं. फिर
ए बबुनी हम तो बिना खाए रह जाएं पर उनका कुछ न छुएं. तब भी वह ऐसी बात
करती हैं कि मन होता है कि जाकर मर जाऊं कहीं." उसकी आवाज़ कभी पाताल से
तो कभी आसमान से आती लग रही थी.
मैंने कहा, "अरे इतनी-सी बात पर मर जाओगी? तुम्हें पूरा हक है वहां
खाने-पीने का." उसकी आंखों में जो भाव उभरा उसे देख कर मैं सहम गई. उसने
प्रतिवाद किया, "नहीं बबुनी हम तो जितना खटते हैं उतना खाते हैं...हम
हराम का नहीं खाते. झट से उसने अपने ब्लाउज़ की बांह ऊपर चढ़ा ली और अपनी
गोरी बांह पर पड़े नीले निशान दिखाने लगी.
"
यह क्या हुआ? "  मैं उसकी गोरी सुघड़ बांह पर बना चोट का निशान देखने लगी.
वो बोली, "सबेरे मनुआ के काका ने पकड़ कर जोर से ऐंठ दिया."
"
अरे क्यों...?"
"
उसकी मां को हमने पट से जवाब जो दे दिया था. उन्हें बर्दास्त नहीं हुआ इसलिए..."
"
क्या कहा तुमने?"
"
बस यही कि चुप रहो बूढा! तुम ही खा गई हो सारा गुड़. जब कर नहीं तो डर
कैसा....जो गलत करे वो डरे. बोलो बबुनी, क्या गलत कहा हमने...पूरा दिन
बूढा गुड़ ही खातीं हैं तभी तो गांव भर के लड़के उनको चिउटा   बुलाते हैं
और वो चिढ़कर हलकान होती हैं!"
मुझे जोर की हंसी आ गई. सुखना बो के होंठ फैल कर थोड़े टेढ़े हो गए. कम
से कम क्रोध करने का तो उसे पूरा हक था. उसकी सास को पूरा गांव चिउटा
बुलाता है यह तो मुझे मालूम था लेकिन क्यों बुलाता था यह सुखना बो से पता
चला था. सुखना बो अपने ऊपर लगे ऐसे इलज़ाम से आहत लग रही थी और इतने
गुस्से में थी कि अपने आक्रोश को बयान करते समय उसकी मुट्ठी भर की नाज़ुक
कमर झुक जा रही रही थी. मैं उसकी खुद्दारी देखकर परेशान हो गई थी.    यह
गांव उसकी खुद्दारी को कितना सहेगा मेरे मन में यह एक बड़ा सवाल था.
सुखना बो के कुएं में कूदने वाली बात के बारे में मामी से पूछा तो मामी
ने भी वही बताया था जो मनीषा ने बताया था.
"
लेकिन सूखे कुएं में क्यों…?"
मनीषा बोली, "अरे जिसको मरने का मन हो जाए वह सूखे कुएं में क्यों
गिरेगा! सुखना बो कम नाटक नहीं करती."
मुझे उसका यह बोलना बिलकुल अच्छा नही लगा. मामी ने बताया, "सुखना ने उसको
बच्चा न जन पाने के लिए बहुत कोसा था. इतना ही नहीं यह भी कहा था कि अगर
मुझमें कमी है तो दिनभर तो खेत-खेत घूमती है किसी और से ही जन्मा के दिखा
दे. यह बात सुखना बो बर्दाश्त नहीं कर पाई और जाके सूखे कुएं में ही कूद
गई.
           
सुखना बो काम करते-करते दर्दीली आवाज़ में विवाह के गीत,
फगुआ,  धान के गीत, ओसावन के गीत गाती. जैसा मौसम हो वैसा गीत. गाते-गाते
रोना उसके लिए बेहद सहज था. वह हरदम रोती थी या हरदम गाती थी समझना बहुत
कठिन होता था, पर उसकी दर्द भरी आवाज़ बताती थी कि अंधेरी रातों में जरूर
उसकी छाती लोहार की भट्ठी की तरह दहकती होगी.

             
एक बार भीतर वाला दालान गोबर से लीपती वह बतियाती रही. मैं
उसकी हथेलियों के सधेपन को मुग्ध हो देख रही थी. एक ही बार में गोबर का
पूरा लेप समेटती वह पीछे खिसकती जाती थी. बात करते-करते मैं बोली, “
सुखना बो,  तुम्हारी अम्मा तुम्हें किस नाम से पुकारती थी हो..."
वह शर्माने लगी. "अपना नाम बताने में काहे की शर्म!" मैंने उसे कुरेदा तो
बोली, "अरी बबुनी जब नैहर ही छूट गया तो अब वह नाम जानकर क्या करोगी?”
बार-बार पूछने पर लजाते हुए बोली, "बबुनी नाम तो हमारा बहुत सुन्दर था
कन्याकुमारी."
मैं अचंभित उसका मुंह देखती रह गई.
"
इतना सुन्दर नाम भूलकर सुखना बो बनी हो!" मैं खुद को बोलने से रोक न पाई.
"
अरे बबुनी धरम पर तो चलना ही है. पति के नाम के आगे हमारा नाम थोड़े
रहेगा हमारी पहचान तो उन्हीं से है ना."

           
सबेरे-शाम घास काटना, दोनों समय खाना बनाना, सास और सुखना को
खिला-पिलाकर सो जाना. अपनी देह में हरहराते यौवन को वह किस थपकी से सुला
देती थी यह तो वही जाने. मैं असहाय हो उससे पूछती, "ए सुखना बो, कभी अपने
नैहर क्यों नहीं जाती हो? जाकर थोड़ा घूमघाम आओ न.
  "
कहां जाएं बबुनी... वहां अब ठौर कहां! एक भाईभौजाई हैं... इतने बरसों
में कितने तीज-त्यौहार आए पर कुएं में धकेलकर कभी झांकने भी तो नहीं आए
वो ..... क्या तीज खिचड़ी का भी हमारा हक नहीं है?” उसके सवाल उसकी
अस्मिता से झरते थे. मैं निरुत्तर हो जाती थी.
"
सुखना बो हम ज़रा ट्यूबबेल घूम आएं... तुम चलोगी?”
"
ना बबुनी बहुत काम है." वह फिर अपने काम में जुट जाती. कभी मामी के लिए
मसाला पीसना, कभी मामी के कपड़े अलगनी से बटोर लाना, तो कभी गोइठा रखकर
बोरसी जलाना. इन्हीं कामों में अस्त-व्यस्त सुखना बो खुद को भी सुलगाती
धुआं हो रही थी और ऐसे छीज रही थी जैसे फसल कटने के बाद खेत  छीजते हैं.
ऐसे में अगर तेजवा को सुखना बो का छीजना मालूम था तो कोई क्या करता और
अगर तेजवा की नज़र सुखना बो पर गड़ी थी तो गांव क्या करता!
                 
सुखना बो देह की लाज ढांपती मरती जा रही थी लेकिन दूसरी
ओर द्रौपदी बनकर जीवित भी हो रही थी. राख के नीचे आग ज़िंदा थी यह मुझे
नहीं मालूम था लेकिन क्या उसे मालूम था. सांझ को जब सुखना बो मामी का
चूल्हा सुलगाने में जुटी होती आंगन में पड़ी खाट पर लेटी गोधूलि में
धुंधलाते हुए तारों में आसमान निहारती हुई मैं सुखना बो के लिए कोई
चमकीला तारा खोजती थी और सोचती थी कि काश, मैं सुखना बो के लिए कुछ भी कर
पाती.
                             
सुखना बो के गांव से अचानक चले जाने के
बाद गांव में रहनेवालों की व्यस्तता बढ़ गयी थी! जिसकी कल्पना जहां तक
जाती थी वह वहां तक अपनी अटकलें दौड़ाता था. दो-चार लोग जहां खड़े हो
जाएं वहीं सुखना बो की बातें होने लगती थीं. कुछ लोग कहते कि तेजवा ने
बहला-फुसला कर उसको किसी दलाल के हाथ बेच दिया और उसका बच्चा भी गिरवा
दिया. कोई कहता कि उसने ले जाकर सुखना बो को कहीँ किसी गड़हे-पोखरे में
धकेल दिया. कोई कुछ तो कोई कुछ. सुबह शाम दोपहर लोग आपस में इस विषय पर
बतियाते रहते. औरतें काम धाम ख़त्म कर एक-दूसरे के घरों में हवा की तरह
दबे पांव जातीं और उसके बारे में एक से एक नई-नई कहानियां सुनाने लगतीं.
एक बार गर्मियों में जब मैं गांव गई थी तब मैंने भी सुखना बो को तेजवा से
खूब हंस-हंस कर बातें करते देखा.  उसकी दुबली-पतली काया तब भरी हुई लगी
थी. तब सुखना बो में मुझे एक दूसरी सुखना बो दिखाई दी थी.
   
सुखना बो के गांव से अचानक चले जाने के बाद जब पहली बार सुखना ने
तेजवा का नाम लेकर उस पर उंगली उठाई थी तो दबंग तेजवा के घर के लोगों ने
सुखना को गरियाकर उसकी सातों पुश्तें तार दी थीं. उस दिन जो चुप हुआ
सुखना तो आज तक उसको बोलते-हंसते किसी ने नहीं देखा. दो रोटी सेंक कर
देनेवाली उसके बुढापे की लाठी और घर की इज्जत अब घर में नहीं थी.
                   
सुखना बो एक बार जो गई तो नहीं लौटी पर तेजवा उसी दिन
सांझ होते-होते गांव लौट आया. तो आखिर सुखना बो कहां चली गई! किसी को कुछ
पता नहीं था. दरअसल तेजवा ने सबको यही बताया कि उस दिन वह तो अपनी बहन के
ससुर की तेरहीं पर उसके गांव गया था. लेकिन दबंग तेजवा पर किसी को भरोसा
नहीं था. वह तो अपनी जवानी के ख़म से पूरे गांव को हांकता था.
                   
सुखना बो कहां गई, उसका क्या हुआ- यह एक रहस्य था.
बाद में मनीषा ने इस रहस्य पर से परदा उठाया था. मुझे नहीं मालूम कि उसे
यह सब कैसे पता था, पर उसके और मेरे लिए इस कहानी के सुखांत में एक संतोष
था. मनीषा ने बताया :  "गांव तो उसको बांझ मानता ही था, सास भी दिन भर
जली-कटी सुनाया करती थी. पर उस दिन सुखना की यह बात उसने मन से लगा ली
कि- बंसहीन बांझ किसी और से ही जन्मा के दिखा दे न...! तब सुखना बो
पोर-पोर से जागी. बरसों बाद उसकी देह की कसक, जिसे वह भुला चुकी थी, उसके
भीतर फुफकार उठी. उसकी देह गोइठा की तरह एकतार सुलगने लगी. वह कई-कई रात
जागती रही. सच तो यह था कि न सुखना यह कहता और न ही सुखना बो तेजवा की
होती.
               "
एक निर्जन दोपहर में घाम की तरह तपती हुई वह खुद ही
तेजवा के दरवाज़े के सामने जाकर खडी हो गई और बेहिचक उसकी कोठरी के
केवाड़ खटखटा दिए.
                   "
तेल पी हुई लाठी जैसे गठीले बदन वाले तेजवा पर कोई
भी औरत भला क्यों न मर जाती! वह तो सुखना बो थी जो इतने दिनों तक खुद को
साधे रही. उसमें भी अगर सुखना ने उसके औरतपने को न ललकारा होता तो वह भला
तेजवा को घास डालती कभी! गांव जानता था कि सुखना बो के मुंह लगने की
हिम्मत खाली तेजवा में थी, जो गुंडई मोहब्बत और गिड़गिड़ाने के सारे कौशल
जानता था.
               "
बूढ़ा की आंखें, जिनमें मोतियाबिंद होने के बाद भी गजब
की चालाकी थी, कई दिनों से सुखना बो के रंग-ढंग में कुछ अलग किस्म के
लक्षण देखने लगी थीं. एक दिन बूढा ने उसको उल्टियां करते देखा तो बोली,
तुम्हारे लच्छन हमें  ठीक नहीं लगते. कहां गई थी बोल... किस पोखरे का
पानी पी आई तू?" सुखना बो अपने स्वभाव के विपरीत अपराधिनी-सी उसे देखती
रही. बूढ़ा के पांव के नीचे की सारी जमीन ही मानो धसक गई. बूढा चिल्लाई,
खर-खानदान धरम-लाज सब ले जाकर सरयू जी में बोर दिया तूने.जितनी
गालियां अबतक उसकी म्यान में थीं उन सबको बूढ़ा ने सुखना बो पर अस्त्र की
तरह चलाया. अपनी नाक पूरी हिफाज़त से आंचल के नीचे ढापे-ढापे ही बूढ़ा ने
उसके सातों जन्मों का हिसाब किया. सुखना बो पहले तो चुपचाप गालियां सुनती
रही फिर दहाड़ कर बोली, ‘बच्चा मैं भी जन सकती हूं बूढा! ...अब मान गईं
न.. अब मेरी छाती पर मूंग न दलना.उसके चेहरे पर विजयिनी मुस्कान आई और
आंखों में काजल की तलवार बेहद धारदार हो गई. वह अब एक नई सुखना बो थी.
गर्वोन्नत, गर्वीली!

    "
यह सब होने के बाद भी बूढा सुखना बो को शरण देने के लिए तैयार थी,
लेकिन तब सुखना का पौरुष अधिक बलशाली हो गया था. कुछ भी हो जाए वह जूठी
औलाद नहीं संभालेगा!

           "
अपनी देह को सुलगाकर उसी से पूरी ज़िन्दगी को सेंकती और उठती
भापों को पीती सुखना बो की आंखें अपनी कोख के जाये का मुंह देखने के लिए
चकोर हो गई थीं. खुद पर कोई बस न रहा. बच्चे के लिए ही वह तेजवा से मिली
थी इसका ज़रा भी अंदाजा तेजवा को नहीं था. उससे बच्चा गिरवाने का मशविरा
सुन कर सुखना बो का हौसला टूटने लगा था. कैसे निकले वो इस मझधार से! कोई
रास्ता नज़र नहीं आता था."
   
मनीषा बता रही थी, मैं सुन रही थी. उसने बताया कि सुखना बो की जिंदगी
में सुखना और तेजवा के अलावा कभी एक और भी शख्स आया था जिसे वो बिसरा
चुकी थी. लेकिन इस मुश्किल घड़ी में उसे उसकी याद आई. उसका नाम महीप था.
             "
बरसों पहले महीप के मनप्राण में उतर कर सुखना बो तिरछी हो
गई थी.  कभी न निकलने के लिए. बरसों से वैसी की वैसी वो आज भी वहां थी.
संयोग ही  था कि जब वह ब्याहकर पहली बार टमटम से सुजानपुरा उतरी थी उसी
सुबह महीप भी शहर से सुजानपुरा लौटा था. चटक लाल साड़ी की गठरी बनी सुखना
बो सुखना के पीछे-पीछे अभिमंत्रित-सी चली आ रही थी. भोर की हवा  उसके
घूंघट से छेड़खानियां कर रही थी. महीप अपनी गहरी निगाहों में जिज्ञासा
भरे हुए घूंघट सहेजती सुखना बो की गोरी-गोरी और पतली उंगलियों को देखने
में सब कुछ भूला हुआ था. ऐसी पतली-पतली उंगलियां उसने आज तक नहीं देखी
थीं. तभी हवा ने सुखना बो का घूंघट हटा दिया था. महीप की पानीदार आंखों
से एक जोड़ी बेचैन मछलियां जाने किस तरह टकराईं कि उसके कलेजे में उसी
दिन उतर गईं और वह जन्म-जन्मान्तर के लिए उसी का होकर रह गया. तब से वह
सड़क-सड़क शहर-शहर घूमा पर कोई और उसे भायी ही नहीं.
                   "
महीप हर साल गांव आता, सुखना बो को एक निगाह देखता
और बिना कुछ बोले फिर शहर वापस हो जाता था. गांव के मेले में सुखना बो
अक्सर महीप को अपनी ओर देखते हुए देखती थी.
           "
उस दिन सुखना बो जब नीम के पेड़ के नीचे निमौरियों की तरह ही
गिरी पडी थी. घास काटकर निढाल हो गयी थी. गांव घर समाज उसके खिलाफ लाठी
उठाए था...वह घर कैसे जाए! घर अब उसका ठिकाना  नहीं रहा गया था.
       “
महीप हर बार की तरह इस बार भी  सुखना बो को देखता निकल गया. मैं
तुम्हारा ही हूं- हमेशा की तरह ऐसा ही कुछ था उसकी आंखों में. उस रोज
सुखना बो पहली बार उसकी आंखों का ये पैगाम पढ़ पाई. रेगिस्तान में अचानक
ढेर-सा पानी कि पीने के बाद भी बच जाए. निढाल और उदास सुखना बो को लगा कि
महीप ने कुछ पूछे बिना भी उसका हालचाल पूछा है. उसका वहां से गुज़रना
सुखना बो को पेड़ की छाया की तरह महसूस हुआ. विचित्र से आह्लाद से भर कर
वह उठी और उसी घर की ओर चल दी जहां खाने के लिए थाली में गालियां थीं और
हर निवाले में ताने थे.
                “
उस रोज के बाद महीप उसे रोज़ सपनों में दिखाई देने लगा.
वह चौंक कर जाग जाती. पूरी-पूरी रात जागती! उसे केवल महीप याद आता है.
कुछ भी तो नहीं कहा उसने फिर यह कैसा ऐतबार!...
   “
उस दिन खेत में घास काटते वक्त महीप उसको दूर से आता हुआ दिखा. उधर
ही ताकने लगी. प्रतीक्षा जैसे उम्मीद में बदल रही हो. तभी देखा तो महीप
ने उसको इशारे से अपने पास बुलाया. उसके पास जाकर खडी हो गई. वह अंकुरित
समय कुछ पलों के लिए जहां का तहां ठहर गया. महीप ने गंभीर आवाज़ में
पूछा, ‘कहां जा रही हो?’
कांपती आवाज़ में वह बोली, ‘कहीं नहीं, बस जरा बरसीम काटने...
शाम को यहीं मिलोगी मुझसे?’ और यह कहने के बाद बगैर जवाब का इंतज़ार किए
जल्दी से चला गया महीप. मगर सुखना बो बारिश में भीगी हुई थरथराती हुई
गौरय्या की तरह अपनी धड़कन को सहज करती अपने गर्भ के शिशु को सहेजने लगी
और वहीँ मेंड़ पर बैठ गई. उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में आंसुओं की बाढ़ आ गई
और मन का सारा बंजर उसमें डूब गया. उसने पीछे मुड़कर देखा तो जाते हुए
महीप ने भी मुड़कर देखा.
                 “
उसी शाम अरहर के खेत जहां ख़त्म होते थे उसी जगह महीप
सुखना बो से मिला. फुसफुसाहटों ने चर्चा को इतना आम बना दिया था कि चहकती
हुई चिड़िया हो या सियार की हुआ-हुआ हो, रात के निचाट में उल्लू का बोलना
या चांद की रोशनी में हवा का बहना...सब एक ही बात कहते थे कि सुखना बो के
पेट में तेजवा का बच्चा है. यह बात महीप को भी मालूम थी. महीप ने सुखना
बो को बिना छुए हुए कहा, ‘कल सुबह चार बजे एकदम भोर में मेरी ट्रेन है.
मेरे साथ  चलना है तो पूरब वाली बंसवारी चली आना, मैं वहीँ मिलूंगा.
सुखना बो निःशब्द उसको देखती रही. उसने महीप से अपने आंसुओं को छुपाना
चाहा लेकिन छिपा नहीं सकी. उसकी आंखें डबडबा कर छलक गईं. महीप ने सीधे
उसकी ओर देखते हुए कहा, ‘किसने तुम्हें छुआ और किसने नहीं. मुझे यह सब
नहीं मालूम. तुम तो आज भी मेरे लिए अक्षत यौवना और कुंआरी हो जैसी तुम तब
थीं जब मैंने तुम्हें पहली बार देखा था.
"
सुखना बो भरी हुई आंखों से रात भर सोचती रही. इतने कांटे थे इस गांव में
कि  कोई भी राह बिना धूप के नहीं थी. इतने बरस हो गए महीप भी तो यहीं
था... फिर मैंने आखिर महीप के प्यार की इस  घनी छांव को पहले कभी क्यों
नहीं देखा. वह रातभर सिर्फ छलक-छलक कर रोती रही. एक पल के लिए भी नहीं सो
सकी.
            “
पूरा गांव जब चैन की नींद सोकर सुबह जागने के लिए आंखें
मिचमिचा रहा था... चमकता सुकवा उगे उससे भी पहले सुखना बो पूरब वाली
बंसवारी पहुंच गई. महीप उसको वहां से ले गया....."
मनीषा जब बता चुकी तो मैंने पाया कि उसके चेहरे पर संतोष की एक आभा थी.
मुझे लगासुखना बो जहां भी होगी सुख से होगी. हम दोनों के चेहरों
पर एक  खुशी थी.

बरसों बाद मामी की बरसी पर मैं और मनीषा मिले थे. गलियारा सूना पड़ा था.
गलियारे के लोहे की छड़ वाले जंगले तक जाकर हमारी निगाहें आपस में टकराई
थीं. मैंने सोचा, मनीषा को अपनी ही सुनाई कहानी पता नहीं याद होगी भी या
नहीं. इस बार मिलने पर मनीषा ने मुझसे सुखना बो के बारे में एक शब्द भी
नहीं कहा. मैं उससे पूछना चाहती थी कि सुखना बो की जो कहानी उसने मुझे
बताई क्या उसे गांव के दूसरे लोग भी जानते हैं. पर मैंने पाया कि खुद
मेरे मन में एक डर था कि कहीं मनीषा की कहानी  झूठी  न हो. मुझे यकीन है कि सुखना
बो ने सचमुच गांव छोड़ने के लिए और अपने आने वाले बच्चे के लिए उसी तरह
महीप के कन्धों का सहारा लिया होगा जिस तरह गर्भ के लिए तेजवा का. लेकिन
एक सवाल फिर भी परेशान करता है कि जिस सुखना बो की खुद्दारी इस गांव में
न अंट सकी तो क्या महीप उसे सहेज पाया होगा. सोचती हूं वह कभी मिले तो 
पूछ लूं उससे .
प्रज्ञा पाण्डेय
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