मंगलवार, 16 अप्रैल 2013


जीने से पहले (कहानी )
            सांझ का झुटपुटा था. गांव के पश्चिमी  कोने के पीपल की सबसे
ऊंची फुनगी से उतरकर सूरज पोखरे की ओट जा रहा था. पोखरे के पानी में
उसकी
किरणें ऐसे उतर रही थीं जैसे दिनभर की थकी-हारी निरुद्देश्य वे वहीँ जाकर
डूब मरेंगी. अंधेरा बस छाने ही वाला था. मनीषा और मैं दोनों तेज़ कदमों
से जल्दी-जल्दी बगीचे से घर की ओर लौट रहे थे. तभी मैं जोर से चिल्लाई
-"वो देखो सुखना बो."
           मनीषा मेरे चिल्लाने पर एकबारगी चौंक गई और अगले ही पल  उसने
मेरी बेवकूफी भरी हरकत पर मुझे जोर से एक  धक्का दे दिया. मैं गिरते-
गिरते बची थी. दरअसल मुझे गलतफहमी हुई थी. मेरे बगल से एकदम सटती हुई कोई
औरत निकली थी जो कद-काठी में हूबहू सुखना बो जैसी थी. आप सोच रहे होंगे
ये सुखना बो कौन है जो मेरे मन पर इस क़दर छाई हुई है कि किसी भी साए में
दिखाई देती है.
                              क्या बताऊं मैं...! वैसे सच तो ये है कि
मैं सुखना बो को खुद भी ठीक से नहीं जानती. किसी इंसान को जान पाना आसान
होता है क्या, वो भी एक औरत. ज़िन्दगी और मौत के छोटे-छोटे एहसासों के
बीच बार-बार जीने-मरने से अजीब पहेली बन जाती है वह. कब वह नदी होती है
और कब ठहरा हुआ तालाब का पानी, कब वह सितारों में चलती है और कब कुएं के
भीतर रास्ता तलाशने लगती है- यह सब कुछ वह जानकर भी नहीं जान पाती है.
अंधेरे हों या उजाले दोनों ही उससे आंखमिचौनी खेलते हैं और वह ज़िंदगी के
हंसोड़ होने का भ्रम पाले रहती है.
                     मां के साथ मैं गर्मियों में ननिहाल गई हुई थी.
अंधेरा ढलने के बाद घर की लड़कियों- औरतों का घर से बाहर होना यहां
परिवार की परम्परा के बेहद खिलाफ था. उस समय तो मनीषा और मैं बस इतना ही
जान रहे थे कि घर पहंचने में जो थोड़ी भी देर हो जाएगी तो हमारी बहुत
कुटम्मस होगी. मनीषा डरती थी मेरी मामी से और मैं उसकी बुआ से. हम दोनों
ममेरी-फुफेरी बहनें थीं लेकिन उससे भी पहले मनीषा मेरी पक्की सहेली थी.
हम दोनों एक-दूसरे का जूठा  खा लेते, कपड़ों की अदला-बदली करते,
कच्ची-पकी इमलियों को आपस में बांटते, रोमांचित और भयभीत होने पर
एक-दूसरे का हाथ पकड़ लेते... और इसी तरह बड़े होते गए  .
                  मुझे वह ढलती सांझ बहुत भा रही थी. आसमान का एक पूरा
कोना बहुत लाल था और पेड़ों की फुनगी की हरी-हरी पत्तियां ललछौंह हो गई
थीं. चारों ओर फैली उस लाली में रोमांच के अलावा दूर-दूर तक अगर कुछ था
तो वे थीं हमारे तेज़ कदमों की ऊबड़खाबड़ आवाजें. हम लगभग दौड़ रहे थे.
मेरा दम फूल रहा था. फिर भी सुखना बो चौड़ी मांग भरे और छपेली साड़ी पहने
बार-बार नज़र के सामने आ रही थी. मुझे लगा कि अगर वह इस दुनिया में थी तो
जरूर आज वह भी मुझे याद कर रही होगी या यह केवल मेरे मन का स्वप्न था.
                          मुझे चार-पांच वर्ष पुरानी अपने बचपन के उस
दिन की वह घटना अनायास याद हो आई और मैंने मनीषा से पूछ ही लिया- "ए
मनीषा, उस दिन सुखना बो इतना किसलिए रो रही थी जिस दिन नाना तेजवा को
मारने उठे थे. तुमको याद है न...और अम्मा और मामी उस समय किसलिए सुखना बो
को इतना ढाढ़स दे रही थीं. मुझे लगता है कि उस दिन कुछ बात तो जरूर थी."
       फिर से सुखना बो की बात छेड़ देने पर मनीषा ने कुछ झल्लाकर कहा,
"तुम भी न गड़े मुर्दे उखाड़ने में जुटी रहती हो. आज उसकी इतनी
याद क्यों आ रही है तुम्हें. अभी कुछ न पूछो... मैं तो अब घर पहुंचकर ही
दम लूंगी, नहीं तो आज तुम फुआ से फिर पिटोगी." उसने ताना मारते हुए कहा.
उसके इस तरह झल्लाने पर मैं चुप रह गई थी और उसको हमेशा की तरह अधिक
समझदार मानते हुए अपनी चाल तेज़ कर दी थी.
                            घर की देहरी से भीतर आते ही हम दालान के घने
अंधेरे को पार कर बड़े आंगन में पहुंचे. आंगन के चारों ओर बने खमिया
अंधेरे में डूबे हुए थे. पूरब वाली खमिया में एक बल्ब ढिबरी की तरह
टिमटिमा रहा था. हर ओर मद्धिम अंधेरे का राज पसरा था, फिर भी बड़े-बड़े
चौकोर पत्थरों से बने पुराने ढंग के उस आंगन में चारखानी आकृतियां अपने
पथरीलेपन के साथ चांदनी रात में और उभर रही थीं. सिलबट्टे की खटर-पटर उस
दो-चार प्राणियों वाले घर में जीवंत थी. मामी रसोयईवाले बरामदे के एक
कोने में मसाला पीस रही थीं और चूल्हा मद्धिम सुलग रहा था. बटलोई में दाल
खदबदा रही थी. मां चूल्हे के पास बैठी थी. मुझे शादी-ब्याह के समय खचाखच
भरा रहने वाला वह मेले जैसा आंगन याद आ रहा था जब एक चारपाई बिछाने के
लिए भी जगह बचानी पड़ती थी और सुखना बो मेरे लिए जगह रोके मेरा इंतज़ार
करती थी. पहुंचते ही चहकती थी- "साम्हारा बबुनी अब हम जात हईं..."
दालान की ऊंची चौखट पार कर हम हाथ-पांव धोने बखरी के अंधेरे की ओर चल
दिए. गलियारा पार करने के बाद अंधेरे में आंखें दिप-दिप जल रही थीं.
सुखना बो के ख्यालों में डूबी हुई मैं बोली- "इतनी कम रोशनी में मुझे कुछ
भी दिखाई नहीं देता है. शायद अब अंधेरे में भी देखने की आदत डालनी होगी."
                पचीस वाट का एक बल्ब अकेले ही बखरी के विशाल अंधेरे से
लड़ता रहता था. उतने बड़े उस घर में बखरी में एकमात्र हैण्डपम्प था जो
छूते ही बेसुर में ही सही मीठे पानी का सोता था. वह बखरी घर की स्त्रियों
के नहाने-धोने के लिए इस्तेमाल होती थी. वहां किसी भी पुरुष का प्रवेश
सर्वथा वर्जित था.
          आंगन से बखरी की ओर जाने के बीच जो गलियारा था वह दो कमरों की
दीवार के बीचोबीच खुद-ब-खुद बन गया था. उस गलियारे में पहुंचते ही अनाजघर
से अनाजों की मिली-जुली सोंधी खुशबू आती थी जिसमें धूल की महक ऐसे सनी
होती थी जैसे कीचड़ में पानी. जिस कमरे में मेरा जन्म हुआ था उस कमरे की
दीवार उस गलियारे से लगी हुई थी. वहां पहुंचते ही मैं सुकून से भर उठती
थी. दिन के उजाले में सुखना बो का घर बखरी में बने लोहे की छड़ वाले
जंगले से साफ़ दिखाई देता था. वह गलियारा मेरा और मनीषा का अड्डा था जहां
हम दोनों मां और मामी की हिदायतों से बच कर दुनिया जहान की झुरमुटी
हरियालियों में खो जाते थे.
                मैं सुखना बो के कटे-फटे मन पर लगे पैबन्दों की गवाह
थी. लेकिन अदभुत था तो उसका रूप जहां उसके दुखों की पूर्ण अनुपस्थिति थी
जैसे सूर्योदय के बाद अंधेरे की. ननिहाल पहुंच मेरी आंखें सबसे पहले उसकी
ही खोजखबर लेती थीं. उसकी लाल-पीली छपेली साड़ी, माथे पर टिकुली, टटकी
भरी हुई मांग, सफ़ेद चौड़े दांत, हल्दी में दूध-केसर मिला गोरा रंग और
उतनी ही चौड़ी उसकी हंसी. सब कुछ बहुत रिझाता था मुझे. उस बार भी जब मैं
गांव पहुंची और थोड़ी देर तक सुखना बो नहीं दिखाई दी तो मैं मामी से पूछ
बैठी- "मामी सुखना बो कहां है?"
   "वह तो कहीं गायब हो गई!" मनीषा पहले ही बोल पडी.
   "कहां?"
   लेकिन तब तक मामी ने मनीषा को डपट कर चुप करा दिया था. मां की चुप्पी
से मुझे लगा कि शायद मां को पहले से मालूम था. उसने मुझे क्यों नहीं
बताया था, यह पूछकर मैं भी मनीषा की तरह डांट नहीं खाना चाहती थी. थोड़ी
ही देर में मैं और मनीषा उसी सुरक्षित गलियारे में पहुच गए.
"वह कहां चली गयी मनीषा?" मैंने पूछा.
"मुझे तो डाउट लगता है कि तेजवा ने ही कुछ इधर-उधर कर दिया है." मनीषा बोली.
"वही तेजवा जो नाना के पास रहता था मजूरी के लिए?"
"हां वही जो दक्खिन टोले का है...लम्बा-तगड़ा भूत जैसा. सुखना बो अम्मा
से कहती थी कि वह उसको खेत-खलिहान में भोर, दुपहरिया, सांझ, रात जब भी
मिल जाता था बहुत तंग करता था. जब वह सबेरे बरसीम काटने निकलती थी और
खांची मेड़ पर रखती थी तो तेजवा उसकी खांची लेकर खेत में चला जाता था कि
वह खेत में जब खांची लेने के लिए तेजवा के पीछे आए तो..."
अचानक मनीषा बोलते-बोलते रुक गई. मैंने उत्सुकता में पूछा -'आए तो...?
मनीषा  खनखना के हंसी और बोली, "एकदम पगली हो, खेत में ही पकड़ के मौज
करने के लिए और क्या!"
"अरे बाप रे ऐसा भी होता है क्या..."
"लो होता क्या नहीं है यहां. खुद को न बचाओ तो इन हरे-भरे खेतों में क्या
न हो जाए. सुखना बो कितनी ही बार खांची छोड़कर बिना घास लिए ही लौट आई
है. " वह फिर थोड़ा रुक कर बोली, "लेकिन इन बातों की किसी को कानोकान खबर
नहीं होने पाती. बस दो-चार औरतें आपस में फुसफुसाकर चाहे जितनी बात कर
लें घर के मर्द तक बात नहीं जाती."
"क्यों?"
"फसाद कौन कराए. मारी तो आखिर औरत ही जाएगी न." मनीषा शांत पानी के नीचे
का हालचाल अक्सर यूं ही बयां कर देती है.
"लेकिन `एक बात जानती हों..."
"क्या?"
"फंसी तो वह तेजवा से ही थी...."
मैं चौंक गई और उसकी बात काट कर बोली- "अच्छा बताओ, अगर उसका चक्कर तेजवा
से था तो इस बाबत वह उस दिन मामी से उसके बारे में भौहें चढ़ाकर इतनी
शिकायत क्यों करती कि जैसे उसे तेजवा मिल जाए तो उसे कच्चा ही खा जाएगी."
मनीषा को अपनी कही बात पर वैसे ही ऐतबार रहता था जैसे बनिए को अपनी तौल
पर होता है. बेहद बेफिक्री से बोली, "ये मुझे  नहीं मालूम मगर जो मैं बता
रही हूं वह राई रत्ती सच है."
    तब तक  मामी ने आवाज़ लगाई और हम दोनों उठकर चल दिए. मामी के
छोटे-छोटे घरेलू काम मैं और मनीषा ही निपटाते थे. सबेरे ही सुहाग की पूजा
के लिए जब हम लोग मां की बचपन की सहेली मनु मौसी को बुलाने उनके घर जा
रहे थे तब मनीषा ने अचानक मुझे रोक लिया.
        "देखो यही तो है वह कुआं जिसमें सुखना बो अपनी सास से गुसियाई
हुई खीझकर कूदी थी."
 "अच्छा!" मैंने अचरज जताया तो वह बोली, "सास-ननद से झगड़कर और आदमी से
मार खाकर औरतें इसी कुएं में तो आकर कूदती हैं, इसमें पानी नहीं है ना!"
वह हंसने लगी.
 उसकी यही आदत मुझे अच्छी नहीं लगती थी. कितनी खीज और क्रोध में भरकर किस
मजबूरी में वे औरतें ऐसा करती होंगी यह मनीषा नहीं समझती.
              मैंने झांक कर देखा. पानी तो था नहीं उसमें, लेकिन खरपतवार
से पटा होने के बाद भी उसकी गहराई कम नहीं थी.  कुएं की पुरानी दीवार से
फूटते पेड़ों की जड़ें पतली शाखाओं के रूप में फैली हुई थीं.

"सांप बिच्छू  क्या कम होंगे इसमें . एक अजगर भी तो यहीँ कही रहता है मनीषा,
 सुना है कि  बहुत पुराना है एकदम काला   ." अरे ..छोड़ उसे इस गाँव में बड़े बड़े अजगर हैं जो मैं बता रही हूँ वह सुन". 
उसने मेरा हाथ पकड़ लिया
मनीषा ने बताया- "गांव के मनचले सुखना बो को बहुत चिढ़ाते थे कि भौजी
तुम्हारा पेटीकोट उठ  गया था जब तुम कुएं में गिरी थीं...तुमको कुछ होश
है कि नहीं." मनीषा ने बताया कि यही वो बात है कि सुखना बो का नाम आते ही
गांव भर के रसिक मर्द क्यों मुस्कराने लगते हैं और औरतें आंचल में चेहरा
छुपाकर क्यों हंसती हैं.

                  मनीषा को गांव भर का बहुत कुछ मालूम था, कि किसको
किससे गर्भ ठहरा, कौन किससे साथ किसकी कोठरी में कौन-सा गुनाह करते पकड़ा
गया.  किसकी चिट्ठी का कौन डाकिया है. टिकोरा लेने के लिए घरनू बढ़ई की
चौदह साल की अधपगली बेटी किस तरह चरन मास्टर के बेटे के साथ दुपहरिया
बिताकर आई और घरनू बढ़ई ने फिर उसको किस तरह मारा कि तीन दिन हल्दी-प्याज
बांधे घर में पड़ी रही. कभी-कभी मुझे उसकी बताई बातें एक रहस्य की तरह
लगतीं. क्या उसे लगता था कि मैं उसकी बातों में कहानी का रस ढूंढ़ती हूं
इसलिए वो बातों की कहानी बनाती थी?
. वो एक सफल किस्सागो थी, और मैं एक उत्सुक श्रोता थी.
 मेरी बांह पर पतलो  से    चीरा लगा और खून बह आया. ऐसे
झाड़-झंखाड़ के रास्ते जाने क्यों ले आती है मनीषा.
     
 सुखना बो के कुएं में जा कूदने वाली  मसालेदार  चर्चा में  उसके आंसुओं से किसी को कोई लेना देना नहीं था 
वैसे ही जैसे अनपढ़ को अक्षरों से नहीं होता  . यह बात हर  संवेदना  से  परे होकर बालक से किशोर होते लड़कों 
तक ऐसे पहुँचती जैसे पुरुषोचित आन बान  बिना सिखाये रक्त में बहती है
                टोले के लड़के जब जुटते और सुखना बो जो दो गली छोड़कर भी
निकले तो ख़ास किस्म के ठहाकों की गूंज सुखना बो के होने को पूरनमासी के
मेले में बिकने वाले खिलौना बना डालती. कुएं वाली घटना के बाद अपने जीवित
बचे रहने पर वह बहुत पछताती थी और बार-बार गांव के दक्खिन बने ताल के
किनारे जा पहुंचती थी लेकिन जीवन के प्रति मोह का कोई अदृश्य तंतु उसे
फिर वापस ले आता था. मुझे लगता था कि ऐसे मौकों पर जरूर उसे द्रौपदी का
चीरहरण याद आता होगा और दुर्योधन का अपनी जांघों पर हाथ फेरना.
                          मनीषा ने बताया कि सुखना बो उस दिन इन्हीं
बातों को लेकर रों रही थी और मामी और मां उसको ढाढ़स दे रही थीं. फिर
उसने मुझे ताना दिया, "देखना कहीं तुम न रोने लगना."
सुखना बो की जिन्दगी का सूत-सूत कातते हुए मनीषा बोली, "उस मैदे की लोई
का उस काले-कलूटे बदसूरत सुखना से भला कोई मेल था!  ऊपर से जानती हो कि
उम्र में वह कितनी छोटी थी सुखना से?.....खुद ही देख लो कि सुखना की कमर
झुक गयी है...जबकि अभी पांच ही महीने तो हुए उसे गायब हुए. खुद ही अंदाज
लगा लो उसकी उम्र का."
"कहां गई वह?" मैं अधीर थी.
"मुझे क्या पता... मुझे तो बस यह याद है कि जब वह एकदम जवान थी यह तब भी
इतना ही बूढा था."
    मुझे याद आया वह जेठ की दुपहरिया थी और उस बड़े से घर के बड़े से
आंगन में सांय-सांय सन्नाटा था. जिस कोने में छांह थी सुखना बो के साथ
मैं वहीँ बैठी थी. मेरे पांवों में अजनबी-सा दर्द था. उसने मेरे पांव
धोये और मालिश के लिए तेल लेकर बैठ गई. मुझे मालूम था कि उसके दर्दों के
आगे मेरे पैर का दर्द तो कुछ भी नहीं था. वह केले के पत्ते-सी फटी हुई
थी, फिर भी मैंने उससे पूछ  ही लिया, "ए सुखना बो, सुखना तुमसे उम्र में
इतना बड़ा है तो तुमने शादी क्यों कर ली उससे... बोलो?"
 सुखना बो ऐसे चुप हो गई जैसे काठ की हो. उसका चेहरा देख मुझे लगा कि
मैंने पूछ कर कोई बड़ी गलती कर दी है. मेरा सवाल बहुत स्पष्ट था...शायद
बहुत उघड़ा हुआ, पर जाने क्यों मुझमें जैसे जवाब पाने की जिद आ गयी थी,
"बोलो न,  तुम्हारी मां को पसंद था क्या सुखना... या कि तुमको?"
सिर झुकाए रही सुखना बो! फिर आंखें नीची किए ही बोली, "बाप थे नहीं थे
हमारे.  माई निपट अकेली थी तो खाली रोती थी! उसको हमारे ब्याह की बड़ी
चिंता थी. एक भाई था तो वह तो और भी नासमझ था."
 "पिता को क्या हो गया था?"
"हारी बीमारी तो लगी ही रहती थी उनको बबुनी,  देह से बहुत कमज़ोर हो गए
थे.  हमारी शादी से साल भर पहले ही एक रात अचानक ख़त्म हों गए." इतना
कहकर वह सिर झुकाकर पांव दबाती रही. मैं चुप रही.
थिर बैठी वह वह फिर बोल पडी, "माई को किसी भी तरह से हमारी शादी करनी थी.
लड़की को खाना-कपड़ा मिले इतना ही देखा बस और कुछ न माई ने देखा  न वह
जानती ही थी."
"क्या उम्र थी तुम्हारी तब सुखना बो?"
        उसकी छतरीली पलकें बादल बन गईं और आंखें डबडबाई घटा, जिनसे मैं
भीग गई. उस चुप बंजर दोपहर में हमारे बीच अनकही आत्मीयता का फूल खिल गया
था. जैसे तितली के पंखो को छूने पर उनके रंग उंगलियों में उतर आते हैं
उसी तरह का कुछ. फिर जब भी वह घर में आती थी एक नज़र मुझको जरूर देखती
थी. "का हो बबुनी".... मैं उत्तर में सिर्फ मुस्करा देती. उसकी बड़ी-बड़ी
आंखों में काजल की सधी हुई पतली धार होती, जैसे म्यान में काले रंग की
कोई अनोखी तलवार हो. मुझे उसकी निरीहता में खुद्दारी की एक झलक दिखाई
देती.

              उससे दोस्ती होने के बाद एक सांझ घूमते-घामते मैं और मनीषा
उसके घर उससे मिलने गईं. उस दिन वह मामी के पास नहीं आई थी...पर यह तो एक
बहाना था. मुझे तो सुखना को देखना था. गांव में पक्के खड़ंजे से लगकर एक
चौड़ी नाली जाती है. उसी खड़ंजे से लगी हुई सुखना बो की फूस की एक
छोटी-सी झोंपड़ी थी. अन्दर मिट्टी की दीवारों पर खड़े दो कमरे, दुआर पर
बंधी एक गाय, गाय की हौदी और हौदी में पड़ा हरा चारा, जिसके लिए सुखना बो
अपनी ज़िंदगी को मरुस्थल बनाए रहती थी और इस खेत से उस खेत हरियाली खोजती
रहती. हम दोनों को देखते ही एकदम खिल गई, "आव बबुनी आव!"
                                  उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में ममता उतर आई
थी. जल्दी से गुड़-पानी लेकर आ गई और हमारे लिए खटिया बिछा खुद जमीन पर
बैठ गई. इतनी आवभगत. मनीषा ने जल्दी जाने की जिद न पकड़ ली होती तो वह
भला मुझे आने देती.  उसी रोज मैंने सुखना को देखा था. सामने से टूटे दो
दांत और सफेद बालों वाला वह सच में उसका पिता ही लग रहा था.


  औरतें बहाव की उलटी धारा में पतवार डाल नहीं उतरतीं, लेकिन सुखना बो
कुछ अलग थी. बार-बार की चोट के बाद भी उसमें अपने वजूद की एक जिद थी. इसी
जिद के जरिए वह अपनी पीड़ाओं से जूझती थी. यह जिद उसका प्रतिरोध थी. कोई
बात बुरी लग जाए तो बगैर खाए-पिए कितने ही दिन गुजार देती थी. बात-बात पर
रूठती थी. शायद खुद से नाराज़ रहती थी या फिर कौन जाने इस दुनिया से ही
नाराज़ थी वह. फिर भी सघन बंसवारी की तरह आकर्षक और रहस्यमय थी. तभी तो
सबसे अलग नज़र आती थी.  एक दिन उसकी डबाडब आंखें देखीं तो मैंने पूछा,
"अरे क्या हुआ..."
वह गुस्से में थी. बोली, "देखो आज बूढा ने कितना बड़ा इलज़ाम लगा दिया
हमपर." वो अपनी सास को बूढ़ा कहती थी. बोली, "कहती हैं कि कूड़े में रखा
सारा गुड़ क्या हुआ. जब हमने कहा कि हम क्या जानें तो कहतीं हैं कि तुम
ही खा गई हो सब." वह तमतमाई हुई थी. उसका आत्मअभिमान कुचले हुए फन-सा था.
बोली, "बबुनी हम क्यों खाएं उनका गुड़...हमें तो गुड़ पसंद ही नहीं. फिर
ए बबुनी हम तो बिना खाए रह जाएं पर उनका कुछ न छुएं. तब भी वह ऐसी बात
करती हैं कि मन होता है कि जाकर मर जाऊं कहीं." उसकी आवाज़ कभी पाताल से
तो कभी आसमान से आती लग रही थी.
मैंने कहा, "अरे इतनी-सी बात पर मर जाओगी? तुम्हें पूरा हक है वहां
खाने-पीने का." उसकी आंखों में जो भाव उभरा उसे देख कर मैं सहम गई. उसने
प्रतिवाद किया, "नहीं बबुनी हम तो जितना खटते हैं उतना खाते हैं...हम
हराम का नहीं खाते. झट से उसने अपने ब्लाउज़ की बांह ऊपर चढ़ा ली और अपनी
गोरी बांह पर पड़े नीले निशान दिखाने लगी.
"यह क्या हुआ? "  मैं उसकी गोरी सुघड़ बांह पर बना चोट का निशान देखने लगी.
वो बोली, "सबेरे मनुआ के काका ने पकड़ कर जोर से ऐंठ दिया."
"अरे क्यों...?"
"उसकी मां को हमने पट से जवाब जो दे दिया था. उन्हें बर्दास्त नहीं हुआ इसलिए..."
"क्या कहा तुमने?"
" बस यही कि चुप रहो बूढा! तुम ही खा गई हो सारा गुड़. जब कर नहीं तो डर
कैसा....जो गलत करे वो डरे. बोलो बबुनी, क्या गलत कहा हमने...पूरा दिन
बूढा गुड़ ही खातीं हैं तभी तो गांव भर के लड़के उनको चिउटा   बुलाते हैं
और वो चिढ़कर हलकान होती हैं!"
मुझे जोर की हंसी आ गई. सुखना बो के होंठ फैल कर थोड़े टेढ़े हो गए. कम
से कम क्रोध करने का तो उसे पूरा हक था. उसकी सास को पूरा गांव चिउटा
बुलाता है यह तो मुझे मालूम था लेकिन क्यों बुलाता था यह सुखना बो से पता
चला था. सुखना बो अपने ऊपर लगे ऐसे इलज़ाम से आहत लग रही थी और इतने
गुस्से में थी कि अपने आक्रोश को बयान करते समय उसकी मुट्ठी भर की नाज़ुक
कमर झुक जा रही रही थी. मैं उसकी खुद्दारी देखकर परेशान हो गई थी.    यह
गांव उसकी खुद्दारी को कितना सहेगा मेरे मन में यह एक बड़ा सवाल था.
सुखना बो के कुएं में कूदने वाली बात के बारे में मामी से पूछा तो मामी
ने भी वही बताया था जो मनीषा ने बताया था.
"लेकिन सूखे कुएं में क्यों…?"
मनीषा बोली, "अरे जिसको मरने का मन हो जाए वह सूखे कुएं में क्यों
गिरेगा! सुखना बो कम नाटक नहीं करती."
मुझे उसका यह बोलना बिलकुल अच्छा नही लगा. मामी ने बताया, "सुखना ने उसको
बच्चा न जन पाने के लिए बहुत कोसा था. इतना ही नहीं यह भी कहा था कि अगर
मुझमें कमी है तो दिनभर तो खेत-खेत घूमती है किसी और से ही जन्मा के दिखा
दे. यह बात सुखना बो बर्दाश्त नहीं कर पाई और जाके सूखे कुएं में ही कूद
गई.
            सुखना बो काम करते-करते दर्दीली आवाज़ में विवाह के गीत,
फगुआ,  धान के गीत, ओसावन के गीत गाती. जैसा मौसम हो वैसा गीत. गाते-गाते
रोना उसके लिए बेहद सहज था. वह हरदम रोती थी या हरदम गाती थी समझना बहुत
कठिन होता था, पर उसकी दर्द भरी आवाज़ बताती थी कि अंधेरी रातों में जरूर
उसकी छाती लोहार की भट्ठी की तरह दहकती होगी.

             एक बार भीतर वाला दालान गोबर से लीपती वह बतियाती रही. मैं
उसकी हथेलियों के सधेपन को मुग्ध हो देख रही थी. एक ही बार में गोबर का
पूरा लेप समेटती वह पीछे खिसकती जाती थी. बात करते-करते मैं बोली, “ए
सुखना बो,  तुम्हारी अम्मा तुम्हें किस नाम से पुकारती थी हो..."
वह शर्माने लगी. "अपना नाम बताने में काहे की शर्म!" मैंने उसे कुरेदा तो
बोली, "अरी बबुनी जब नैहर ही छूट गया तो अब वह नाम जानकर क्या करोगी?”
बार-बार पूछने पर लजाते हुए बोली, "बबुनी नाम तो हमारा बहुत सुन्दर था…
कन्याकुमारी."
मैं अचंभित उसका मुंह देखती रह गई.
"इतना सुन्दर नाम भूलकर सुखना बो बनी हो!" मैं खुद को बोलने से रोक न पाई.
"अरे बबुनी धरम पर तो चलना ही है. पति के नाम के आगे हमारा नाम थोड़े
रहेगा हमारी पहचान तो उन्हीं से है ना."

           सबेरे-शाम घास काटना, दोनों समय खाना बनाना, सास और सुखना को
खिला-पिलाकर सो जाना. अपनी देह में हरहराते यौवन को वह किस थपकी से सुला
देती थी यह तो वही जाने. मैं असहाय हो उससे पूछती, "ए सुखना बो, कभी अपने
नैहर क्यों नहीं जाती हो? जाकर थोड़ा घूमघाम आओ न.”
  "कहां जाएं बबुनी... वहां अब ठौर कहां! एक भाईभौजाई हैं... इतने बरसों
में कितने तीज-त्यौहार आए पर कुएं में धकेलकर कभी झांकने भी तो नहीं आए
वो ..... क्या तीज खिचड़ी का भी हमारा हक नहीं है?” उसके सवाल उसकी
अस्मिता से झरते थे. मैं निरुत्तर हो जाती थी.
"सुखना बो हम ज़रा ट्यूबबेल घूम आएं... तुम चलोगी?”
"ना बबुनी बहुत काम है." वह फिर अपने काम में जुट जाती. कभी मामी के लिए
मसाला पीसना, कभी मामी के कपड़े अलगनी से बटोर लाना, तो कभी गोइठा रखकर
बोरसी जलाना. इन्हीं कामों में अस्त-व्यस्त सुखना बो खुद को भी सुलगाती
धुआं हो रही थी और ऐसे छीज रही थी जैसे फसल कटने के बाद खेत  छीजते हैं.
ऐसे में अगर तेजवा को सुखना बो का छीजना मालूम था तो कोई क्या करता और
अगर तेजवा की नज़र सुखना बो पर गड़ी थी तो गांव क्या करता!
                 सुखना बो देह की लाज ढांपती मरती जा रही थी लेकिन दूसरी
ओर द्रौपदी बनकर जीवित भी हो रही थी. राख के नीचे आग ज़िंदा थी यह मुझे
नहीं मालूम था लेकिन क्या उसे मालूम था. सांझ को जब सुखना बो मामी का
चूल्हा सुलगाने में जुटी होती आंगन में पड़ी खाट पर लेटी गोधूलि में
धुंधलाते हुए तारों में आसमान निहारती हुई मैं सुखना बो के लिए कोई
चमकीला तारा खोजती थी और सोचती थी कि काश, मैं सुखना बो के लिए कुछ भी कर
पाती.
                              सुखना बो के गांव से अचानक चले जाने के
बाद गांव में रहनेवालों की व्यस्तता बढ़ गयी थी! जिसकी कल्पना जहां तक
जाती थी वह वहां तक अपनी अटकलें दौड़ाता था. दो-चार लोग जहां खड़े हो
जाएं वहीं सुखना बो की बातें होने लगती थीं. कुछ लोग कहते कि तेजवा ने
बहला-फुसला कर उसको किसी दलाल के हाथ बेच दिया और उसका बच्चा भी गिरवा
दिया. कोई कहता कि उसने ले जाकर सुखना बो को कहीँ किसी गड़हे-पोखरे में
धकेल दिया. कोई कुछ तो कोई कुछ. सुबह शाम दोपहर लोग आपस में इस विषय पर
बतियाते रहते. औरतें काम धाम ख़त्म कर एक-दूसरे के घरों में हवा की तरह
दबे पांव जातीं और उसके बारे में एक से एक नई-नई कहानियां सुनाने लगतीं.
एक बार गर्मियों में जब मैं गांव गई थी तब मैंने भी सुखना बो को तेजवा से
खूब हंस-हंस कर बातें करते देखा.  उसकी दुबली-पतली काया तब भरी हुई लगी
थी. तब सुखना बो में मुझे एक दूसरी सुखना बो दिखाई दी थी.
    सुखना बो के गांव से अचानक चले जाने के बाद जब पहली बार सुखना ने
तेजवा का नाम लेकर उस पर उंगली उठाई थी तो दबंग तेजवा के घर के लोगों ने
सुखना को गरियाकर उसकी सातों पुश्तें तार दी थीं. उस दिन जो चुप हुआ
सुखना तो आज तक उसको बोलते-हंसते किसी ने नहीं देखा. दो रोटी सेंक कर
देनेवाली उसके बुढापे की लाठी और घर की इज्जत अब घर में नहीं थी.
                   सुखना बो एक बार जो गई तो नहीं लौटी पर तेजवा उसी दिन
सांझ होते-होते गांव लौट आया. तो आखिर सुखना बो कहां चली गई! किसी को कुछ
पता नहीं था. दरअसल तेजवा ने सबको यही बताया कि उस दिन वह तो अपनी बहन के
ससुर की तेरहीं पर उसके गांव गया था. लेकिन दबंग तेजवा पर किसी को भरोसा
नहीं था. वह तो अपनी जवानी के ख़म से पूरे गांव को हांकता था.
                   सुखना बो कहां गई, उसका क्या हुआ- यह एक रहस्य था.
बाद में मनीषा ने इस रहस्य पर से परदा उठाया था. मुझे नहीं मालूम कि उसे
यह सब कैसे पता था, पर उसके और मेरे लिए इस कहानी के सुखांत में एक संतोष
था. मनीषा ने बताया :  "गांव तो उसको बांझ मानता ही था, सास भी दिन भर
जली-कटी सुनाया करती थी. पर उस दिन सुखना की यह बात उसने मन से लगा ली
कि- बंसहीन बांझ किसी और से ही जन्मा के दिखा दे न...! तब सुखना बो
पोर-पोर से जागी. बरसों बाद उसकी देह की कसक, जिसे वह भुला चुकी थी, उसके
भीतर फुफकार उठी. उसकी देह गोइठा की तरह एकतार सुलगने लगी. वह कई-कई रात
जागती रही. सच तो यह था कि न सुखना यह कहता और न ही सुखना बो तेजवा की
होती.
               "एक निर्जन दोपहर में घाम की तरह तपती हुई वह खुद ही
तेजवा के दरवाज़े के सामने जाकर खडी हो गई और बेहिचक उसकी कोठरी के
केवाड़ खटखटा दिए.
                   "तेल पी हुई लाठी जैसे गठीले बदन वाले तेजवा पर कोई
भी औरत भला क्यों न मर जाती! वह तो सुखना बो थी जो इतने दिनों तक खुद को
साधे रही. उसमें भी अगर सुखना ने उसके औरतपने को न ललकारा होता तो वह भला
तेजवा को घास डालती कभी! गांव जानता था कि सुखना बो के मुंह लगने की
हिम्मत खाली तेजवा में थी, जो गुंडई मोहब्बत और गिड़गिड़ाने के सारे कौशल
जानता था.
               "बूढ़ा की आंखें, जिनमें मोतियाबिंद होने के बाद भी गजब
की चालाकी थी, कई दिनों से सुखना बो के रंग-ढंग में कुछ अलग किस्म के
लक्षण देखने लगी थीं. एक दिन बूढा ने उसको उल्टियां करते देखा तो बोली,
“तुम्हारे लच्छन हमें  ठीक नहीं लगते. कहां गई थी बोल... किस पोखरे का
पानी पी आई तू?" सुखना बो अपने स्वभाव के विपरीत अपराधिनी-सी उसे देखती
रही. बूढ़ा के पांव के नीचे की सारी जमीन ही मानो धसक गई. बूढा चिल्लाई,
‘खर-खानदान धरम-लाज सब ले जाकर सरयू जी में बोर दिया तूने.’ जितनी
गालियां अबतक उसकी म्यान में थीं उन सबको बूढ़ा ने सुखना बो पर अस्त्र की
तरह चलाया. अपनी नाक पूरी हिफाज़त से आंचल के नीचे ढापे-ढापे ही बूढ़ा ने
उसके सातों जन्मों का हिसाब किया. सुखना बो पहले तो चुपचाप गालियां सुनती
रही फिर दहाड़ कर बोली, ‘बच्चा मैं भी जन सकती हूं बूढा! ...अब मान गईं
न.. अब मेरी छाती पर मूंग न दलना.’ उसके चेहरे पर विजयिनी मुस्कान आई और
आंखों में काजल की तलवार बेहद धारदार हो गई. वह अब एक नई सुखना बो थी.
गर्वोन्नत, गर्वीली!

    "यह सब होने के बाद भी बूढा सुखना बो शरण देने के लिए तैयार थी,
लेकिन तब सुखना का पौरुष अधिक बलशाली हो गया था. कुछ भी हो जाए वह जूठी
औलाद नहीं संभालेगा!

           "अपनी देह को सुलगाकर उसी से पूरी ज़िन्दगी को सेंकती और उठती
भापों को पीती सुखना बो की आंखें अपनी कोख के जाये का मुंह देखने के लिए
चकोर हो गई थीं. खुद पर कोई बस न रहा. बच्चे के लिए ही वह तेजवा से मिली
थी इसका ज़रा भी अंदाजा तेजवा को नहीं था. उससे बच्चा गिरवाने का मशविरा
सुन कर सुखना बो का हौसला टूटने लगा था. कैसे निकले वो इस मझधार से! कोई
रास्ता नज़र नहीं आता था."
    मनीषा बता रही थी, मैं सुन रही थी. उसने बताया कि सुखना बो की जिंदगी
में सुखना और तेजवा के अलावा कभी एक और भी शख्स आया था जिसे वो बिसरा
चुकी थी. लेकिन इस मुश्किल घड़ी में उसे उसकी याद आई. उसका नाम महीप था.
             "बरसों पहले महीप के मनप्राण में उतर कर सुखना बो तिरछी हो
गई थी.  कभी न निकलने के लिए. बरसों से वैसी की वैसी वो आज भी वहां थी.
संयोग ही  था कि जब वह ब्याहकर पहली बार टमटम से सुजानपुरा उतरी थी उसी
सुबह महीप भी शहर से सुजानपुरा लौटा था. चटक लाल साड़ी की गठरी बनी सुखना
बो सुखना के पीछे-पीछे अभिमंत्रित-सी चली आ रही थी. भोर की हवा  उसके
घूंघट से छेड़खानियां कर रही थी. महीप अपनी गहरी निगाहों में जिज्ञासा
भरे हुए घूंघट सहेजती सुखना बो की गोरी-गोरी और पतली उंगलियों को देखने
में सब कुछ भूला हुआ था. ऐसी पतली-पतली उंगलियां उसने आज तक नहीं देखी
थीं. तभी हवा ने सुखना बो का घूंघट हटा दिया था. महीप की पानीदार आंखों
से एक जोड़ी बेचैन मछलियां जाने किस तरह टकराईं कि उसके कलेजे में उसी
दिन उतर गईं और वह जन्म-जन्मान्तर के लिए उसी का होकर रह गया. तब से वह
सड़क-सड़क शहर-शहर घूमा पर कोई और उसे भायी ही नहीं.
                   "महीप हर साल गांव आता, सुखना बो को एक निगाह देखता
और बिना कुछ बोले फिर शहर वापस हो जाता था. गांव के मेले में सुखना बो
अक्सर महीप को अपनी ओर देखते हुए देखती थी.
           "उस दिन सुखना बो जब नीम के पेड़ के नीचे निमौरियों की तरह ही
गिरी पडी थी. घास काटकर निढाल हो गयी थी. गांव घर समाज उसके खिलाफ लाठी
उठाए था...वह घर कैसे जाए! घर अब उसका ठिकाना  नहीं रहा गया था.
       “महीप हर बार की तरह इस बार भी  सुखना बो को देखता निकल गया. मैं
तुम्हारा ही हूं- हमेशा की तरह ऐसा ही कुछ था उसकी आंखों में. उस रोज
सुखना बो पहली बार उसकी आंखों का ये पैगाम पढ़ पाई. रेगिस्तान में अचानक
ढेर-सा पानी कि पीने के बाद भी बच जाए. निढाल और उदास सुखना बो को लगा कि
महीप ने कुछ पूछे बिना भी उसका हालचाल पूछा है. उसका वहां से गुज़रना
सुखना बो को पेड़ की छाया की तरह महसूस हुआ. विचित्र से आह्लाद से भर कर
वह उठी और उसी घर की ओर चल दी जहां खाने के लिए थाली में गालियां थीं और
हर निवाले में ताने थे.
                “उस रोज के बाद महीप उसे रोज़ सपनों में दिखाई देने लगा.
वह चौंक कर जाग जाती. पूरी-पूरी रात जागती! उसे केवल महीप याद आता है.
कुछ भी तो नहीं कहा उसने फिर यह कैसा ऐतबार!...
   “उस दिन खेत में घास काटते वक्त महीप उसको दूर से आता हुआ दिखा. उधर
ही ताकने लगी. प्रतीक्षा जैसे उम्मीद में बदल रही हो. तभी देखा तो महीप
ने उसको इशारे से अपने पास बुलाया. उसके पास जाकर खडी हो गई. वह अंकुरित
समय कुछ पलों के लिए जहां का तहां ठहर गया. महीप ने गंभीर आवाज़ में
पूछा, ‘कहां जा रही हो?’
कांपती आवाज़ में वह बोली, ‘कहीं नहीं, बस जरा बरसीम काटने...’
‘शाम को यहीं मिलोगी मुझसे?’ और यह कहने के बाद बगैर जवाब का इंतज़ार किए
जल्दी से चला गया महीप. मगर सुखना बो बारिश में भीगी हुई थरथराती हुई
गौरय्या की तरह अपनी धड़कन को सहज करती अपने गर्भ के शिशु को सहेजने लगी
और वहीँ मेंड़ पर बैठ गई. उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में आंसुओं की बाढ़ आ गई
और मन का सारा बंजर उसमें डूब गया. उसने पीछे मुड़कर देखा तो जाते हुए
महीप ने भी मुड़कर देखा.
                 “उसी शाम अरहर के खेत जहां ख़त्म होते थे उसी जगह महीप
सुखना बो से मिला. फुसफुसाहटों ने चर्चा को इतना आम बना दिया था कि चहकती
हुई चिड़िया हो या सियार की हुआ-हुआ हो, रात के निचाट में उल्लू का बोलना
या चांद की रोशनी में हवा का बहना...सब एक ही बात कहते थे कि सुखना बो के
पेट में तेजवा का बच्चा है. यह बात महीप को भी मालूम थी. महीप ने सुखना
बो को बिना छुए हुए कहा, ‘कल सुबह चार बजे एकदम भोर में मेरी ट्रेन है.
मेरे साथ  चलना है तो पूरब वाली बंसवारी चली आना, मैं वहीँ मिलूंगा.’
सुखना बो निःशब्द उसको देखती रही. उसने महीप से अपने आंसुओं को छुपाना
चाहा लेकिन छिपा नहीं सकी. उसकी आंखें डबडबा कर छलक गईं. महीप ने सीधे
उसकी ओर देखते हुए कहा, ‘किसने तुम्हें छुआ और किसने नहीं. मुझे यह सब
नहीं मालूम. तुम तो आज भी मेरे लिए अक्षत यौवना और कुंआरी हो जैसी तुम तब
थीं जब मैंने तुम्हें पहली बार देखा था.’
"सुखना बो भरी हुई आंखों से रात भर सोचती रही. इतने कांटे थे इस गांव में
कि  कोई भी राह बिना धूप के नहीं थी. इतने बरस हो गए महीप भी तो यहीं
था... फिर मैंने आखिर महीप के प्यार की इस  घनी छांव को पहले कभी क्यों
नहीं देखा. वह रातभर सिर्फ छलक-छलक कर रोती रही. एक पल के लिए भी नहीं सो
सकी.
            “पूरा गांव जब चैन की नींद सोकर सुबह जागने के लिए आंखें
मिचमिचा रहा था... चमकता सुकवा उगे उससे भी पहले सुखना बो पूरब वाली
बंसवारी पहुंच गई. महीप उसको वहां से ले गया....."
मनीषा जब बता चुकी तो मैंने पाया कि उसके चेहरे पर संतोष की एक आभा थी.
मुझे लगा,  सुखना बो जहां भी होगी सुख से होगी. हम दोनों के चेहरों
पर एक  खुशी थी.

बरसों बाद मामी की बरसी पर मैं और मनीषा मिले थे. गलियारा सूना पड़ा था.
गलियारे के लोहे की छड़ वाले जंगले तक जाकर हमारी निगाहें आपस में टकराई
थीं. मैंने सोचा, मनीषा को अपनी ही सुनाई कहानी पता नहीं याद होगी भी या
नहीं. इस बार मिलने पर मनीषा ने मुझसे सुखना बो के बारे में एक शब्द भी
नहीं कहा. मैं उससे पूछना चाहती थी कि सुखना बो की जो कहानी उसने मुझे
बताई क्या उसे गांव के दूसरे लोग भी जानते हैं. पर मैंने पाया कि खुद
मेरे मन में एक डर था कि कहीं मनीषा की कहानी  झूठी  न हो. मुझे यकीन है कि सुखना
बो ने सचमुच गांव छोड़ने के लिए और अपने आने वाले बच्चे के लिए उसी तरह
महीप के कन्धों का सहारा लिया होगा जिस तरह गर्भ के लिए तेजवा का. लेकिन
एक सवाल फिर भी परेशान करता है कि जिस सुखना बो की खुद्दारी इस गांव में
न अंट सकी तो क्या महीप उसे सहेज पाया होगा. सोचती हूं वह कभी मिले तो 
पूछ लूं उससे .
प्रज्ञा पाण्डेय
!

रविवार, 25 दिसम्बर 2011

स्त्री की देह भी अपनी नहीं

आज के समय  में  या आज से पहले देह से बाहर स्त्री  का कोई अस्तित्व न था और न है !हाँ ! पत्थर युग में  था !स्त्री तब अपने आदिम गुणों के साथ मौजूद थी .
                       आज की सामजिक जटिलताओं में  हर जगह स्त्री  देह के रूप में ही मिलती है ! निश्चित रूप से समाज के जटिल होने की यह एक बड़ी   वजह  लगती है ! समाज, परिवार, राजनीति, व्यवसाय, नौकरी जहाँ भी स्त्री है वहाँ वह स्वतन्त्र अस्तित्व के रूप में नहीं बल्कि देह के रूप में है ! यदि वह देह के बाहर आकर अपनी ऊर्जा से स्वप्न रचना चाहती है, मर्दवादी व्यस्था को तोड़कर सिर्फ मनुष्य बनती है, आकाश कुसुम तोड़ने के लिए  अपनी शक्ति और सौन्दर्य से जीवन के  ताने बाने रचने का साहस करती है तो रास्ते से हमेशा के लिए हटा दी जाती है यानि मार दी जाती है ! एक नहीं अनेकों बार यही हुआ है, हो रहा है और फिलहाल होते रहने के आसार भी  सारे खतरों के साथ हर  जगह  मौजूद हैं ! स्त्री यदि  खूबसूरत है यानि दैहिक सौन्दर्य के सारे मानदंड(जो पुरुषों द्वारा बनाये गए हैं ) यदि उस पर खरे उतरते हों  और इसके साथ ही  साथ वह स्वप्न भी पाल रही हो और अपने अधिकारों की बात करने लगी हो उसके लिए बनायी गयीं चौहद्दियों को तोड़ने लगी हो  तब तो उसका बचना असंभव है !अपनी देह लिए भागी  भागी  फिरने के अतिरिक्त उसके पास दूसरा कोई  रास्ता नहीं होता है या फिर एक दूसरा रास्ता है यदि  वह मनुष्य होने के अपने दावे को छोड़ दे और  देह के स्तर पर  समझौते करके समाधान पा ले !  रेशा रेशा छीजकर वह ऐसा भी करती है  जो अनिश्चिकालीन और पूर्णतः  असुरक्षित होता है और जिसमें वह सिर्फ देह के रूप में जीवित रहती है ! तब क्या करे वह ! क्या होगा उसके स्वप्नों और उसकी  आकांक्षाओं  का ! उसके मनुष्य योनि में जन्म लेने का !.
                            पुरुषवादी व्यवस्था में वह दूसरी व्यवस्था कैसे रचे.! एक सत्ता के अधीन होते हुए वह दूसरी सत्ता कैसे बनाये ! यहीं से शुरू होता है उसका संघर्ष ! पुरुष के सहारे के बिना वह कुछ कर भी तो नहीं सकती है ! चप्पे चप्पे पर पुरुष है ! यहाँ तक कि  उसके गर्भाशय पर भी पुरुष का ही कब्ज़ा  है ! वही पुरुष जिसने उसको  सिर्फ देह घोषित किया है ! जिसने उसके लिए सोने की भारी-भारी हथकड़ियाँ और बेड़ियाँ बनवायीं, ऊंची  दीवारें बनवायीं और ऐसी वैवाहिक व्यवस्था बनायी   जिसमें उसको अपना सर्वस्व देना है ! बदले में स्त्री को  पाना है उसकी देह और मन पर किसी भी पुरुष का स्वामित्व ! 
क्या यह विमर्श का विषय नहीं  कि बुद्धिमान स्त्री को बुद्धिमान पुरुष की आवश्यकता होती है ! उसे किसी भी पुरुष की आवश्यकता नहीं होती ! विवाह की व्यवस्था  समाज और  देह की व्यवस्था है. यह व्यवस्था किसी भी तरह से स्त्री के पक्ष में नहीं है  !  
                                                     यदि पुरुष सचमुच ईमानदार है तो  देह- बल से युक्त होने के बाद भी क्यों नहीं स्त्री की स्वतंत्रता की आचार संहिता  भी बनाता है  जिसमें वह उसकी देह को और उसके गर्भाशय   को आज़ाद करता है ! क्यों नहीं वह उसको अपने स्वप्न रचने के लिए आज़ाद करता है !  एक ओर तो उसको आधी दुनिया की संज्ञा देता है दूसरी ओर उस आधी आबादी को अपना गुलाम भी बनाता है !तब वह आधी आबादी कहाँ है! कैसे है ! यह सारे सवाल पुरुष से ही पूछने ज़रूरी हैं .इनके जवाब उसे ही देने हैं  क्योंकि स्त्री उसकी देह-बल के कारण गुलाम है ! स्त्री की गुलामी की
सिर्फ इतनी वजह है ! जिसकी लाठी है  उसकी ही  भैंस है  !
                                 स्त्री के प्रेम में एकनिष्ठता होती है जबकि पुरुष एक साथ कई स्त्रियों से सम्बन्ध स्थापित करने में कोई गुरेज नहीं करता है !
                                         स्त्री  के पास भी  बुद्धि, ज्ञान, हौसले, सपने, चाहतें, इच्छाएं, आत्मसम्मान, स्वाभिमान उसकी अपनी अस्मिता और अपनी  निजता के तमाम मायने हैं ! उसकी देह देखने के लिए नहीं है, न ही वह  कोई तमाशा है जिससे  मेले-ठेले में और  भीड़ भरी जगहों पर मनोरजन किया जाए!  वह देह मात्र  है ही नहीं  उसकी देह भी पुरुष-देह की तरह स्वप्नों को रचने का माध्यम  है . इस दुनिया में वह भी प्राकृतिक रूप से  बेहद  शक्ति सम्पन्न एक इकाई है! पुरुष -देह की निजता जिस तरह उसकी है उसी तरहस्त्री की देह की भी  निजता है  ! वह  खिलौना  नहीं है जिसको ललचाई और वासनामय  नज़रों से देखने की  (  नयन सुख   की ) पुरुष को खुली आज़ादी  है ! उसकी जाँघों में भी उतनी ही शिराएँ , हड्डियाँ और खून है जितना कि पुरुष की जाँघों   में है ! बिना उसकी सहमति के सरेआम  उसकी देह को देख कर वासनामय हुआ जाए यह  भी जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है ! यह स्त्री की अस्मिता और उसकी निजता का  हनन तो  है ही पुरुष का भी घोर पतन   है ! कब प्रकृति ने यह कह दिया कि स्त्री को वासना से भर कर देखो !क्या प्रकृति ने यह नहीं कहा कि  स्त्री सदियों से संतति को जन्म देती आ रही  है! नौ माह पेट में उसको रखकर अपना खून और अपनी देह का सत्व देकर   तैयार करती है उसे अपने स्तनों से दूध पिलाती  है ! इस स्त्री की सत्ता को पुरुष स्वीकार ही नहीं करना चाहता है .
                                             कहते हैं गर्भ के दौरान होने वाली विपरीत परिस्थितियों  में भी कन्या भ्रूण के जीवित बचने की संभावना पुरुष भ्रूण की  तुलना में अधिक  होती है ! पुरुष की तुलना में वह धैर्यशील अधिक है  ! सारे गुणों से संपन्न होने   के  बावजूद  स्त्री पुरुष को वासनामय
बजबजहाटों के बीच  योनि का आकार मात्र लगती है ? ऐसा है तो यह  असहनीय और निंदनीय है !  पुरुष का   पौरुष और उसका   शारीरिक बल पशुवत है   यदि वह  रक्षा करना नहीं जानता है  . अपने इस प्रकृति प्रदत्त देह बल का वह  भरपूर दुरुपयोग करता है और स्त्री को मात्र योनि मानकर स्वयं को पशु साबित करने के लिए इस नकली ढोंगी और तथाकथित अभिजात्य समाज में  बौद्धिकता का जामा पहनकर खुद को  पुरुष और मनुष्य कहता है !
                                     इस ब्रह्माण्ड के रहस्यों के ढूँढने में जिस मनुष्य ने प्रकृति का कोना कोना छाना है  ! वही मनुष्य स्त्री को रहस्यमय बनाये रखने  के लिए कितने  कुतर्क गढ़ता है !  बात बात पर अपने तर्कों की दृढ़ता के लिए   बिहारी, कालिदास, और विद्यापति जैसे बड़े बड़े कवियों के  नामों का हवाला देना और यह कहना कि   उन्होंने स्त्री की देह पर कसीदे काढ़े हैं! यह तो मूढ़ मति का  परिचायक होने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं ! 
                                                     कालिदास की रचनाओं में प्रेम और सौन्दर्य है ! ऐसा ही बिहारी और विद्यापति या अन्य किसी श्रृंगारिक रचना के  साथ है ! साहित्य क्या सौन्दर्य के बिना रचा जा सकता है !साहित्य ही नहीं क्या कुछ भी  प्रेम के बिना रचा जा सकता है ! जिस तरह नवजात शिशु, यह धरती, यह आकाश और पृथ्वी सभी  रंग, सारे पक्षी, पर्वत,  और नदियाँ सुन्दर हैं जिस तरह इन्द्रधनुष और बादल सुन्दर हैं उसी तरह स्त्री भी प्रकृति की अन्यतम  कृति है! पुरुष का  देह-सौष्ठव भी प्रकृति की ही देन है !ऐसी स्थिति में एक दूसरे का भरपूर सम्मान करना ही न्यायोचित है .
                                              मनुष्य का स्वभाव ही प्रेम करने का है वह हर सुन्दर चीज़ से प्रेम करता है ! खजुराहो प्रेम और सौन्दर्य का प्रतीक है! हमारी तो  संस्कृति ही सौन्दर्य और प्रेम पर आधारित है ! वासना  मनुष्य को  पशु में बदल देती है ! अपने शिकार पर झपटते  हुए उसकी आँखों में  भूख और  वासना होती है !
                          आप तब तक स्त्री की देह को देखने का लोभ बनाए रहेंगे   जब तक  वह सात पर्दों में होगी ! उसके चेहरे पर जब नकाब होती है तब उसका नकाब उलट देने की  आपकी आदिम  इच्छा असहनीय होती है ! .उसकी जांघें और उसकी पीठ जब तक ढकी रहेगी तब तक  वासनामय दृष्टि को रोकना कठिन होगा ! यह सच है !
                 स्त्री और पुरुष जिस दिन साथ चलेंगे ..उस दिन न  तो देह की बात बचेगी न ही मुक्ति की!तब शायद  ये ज़रूर हो पाये कि  स्त्री अपने  गर्भ और देह की निजता पर स्वयं  फैसले कर सके !
                सत्ता कभी अच्छी नहीं होती चाहे वह स्त्री की ही क्यों न हो ! सत्ता सपनों को मारती है !मातृसत्ता में भी वही खामियां होंगी जो पुरुष सत्ता में हैं  !  अंततः यह समाज नैतिकता और ईमानदारी  की कसौटी पर ही कसा जाएगा ! क्यों न पूर्ण मनुष्य बनने का प्रयास किया  जाए और स्त्री को भी मनुष्य की श्रेणी में रखा जाए  !      
                           कलुषित मानसिकता के दंभ में उलझी पुरुषवादी दृष्टि को सदा के लिए समाप्त करके ही समाज रचनात्मक हो सकेगा !  स्त्री को देह मानने का  संस्कार छोड़ देना ही उचित है ! शायद यह वक़्त बदले और स्त्री अपनी देह और अपने गर्भ  पर अपने वाजिब  अधिकारों को  पा सके !

प्रज्ञा पाण्डेय

बृहस्पतिवार, 28 जुलाई 2011

कुछ आहें बयां तो होंगी !

दर्द-ए-बयां है ये 
 आधी नींद से  जागने के बाद सो पाना असंभव हों जाता है बल्कि उचटी हुई नींद तभी चैन लेती है जब वह पूरी तरह से जाग ले और सब कुछ व्यवस्थित कर ले  क्योंकि नींद कभी बिना वजह नहीं उचटती ! सदियों से आधी  नींद  सोयी स्त्रियाँ अब उचटी हुई नींद से धीरे धीरे ही सही  बाहर आ रही हैं !
                    यदि पूछा जाए कि दिल्ली में होंने वाले ३१जुलाई  के बेशर्म मार्च में क्या आप भी भाग लेने जायेंगे ?
             तो क्या जवाब होगा आपका हाँ या नहीं ? आपको मालूम है भी है, ये बेशरम मार्च  क्या है?
दिल्ली में ३१ जुलाई  को कुछ समय पहले कनाडा में हुए स्लट मार्च की तर्ज़ पर वहाँ की स्त्रियों ने बेशर्म मार्च निकालने का फैसला लिया है  जो जंतर मंतर से शुरू होकर ...तक जाएगा ! उसमें भाग लेने वाली लड़कियां व्  स्त्रियाँ साड़ी  से लेकर शोर्ट्स तक पहन सकतीं हैंया फिर जो भी सामान्य कपडे वे रोज़मर्रा के जीवन में पहनती हैं ! बेशर्म मार्च में किसी तरह का अश्लील या अशिष्ट ड्रेस पहनने का कोई अर्थ बिलकुल नहीं है बल्कि यह मार्च दुखती रग का एक दर्दे बयान है  ..  . 

हुआ यूँ कि कनाडा में किसी लड़की के खुले कपड़ों पर आपत्ति जताते हुए किसी पुलिस वाले ने उसे ढंग से कपडे पहननें  की सलाह दे डाली .बिना मांगे राय देना तो वैसे भी गलत होता है   ..पुलिसवाले को अपनी अल्प समझ भर स्त्रियों के साथ होने वाली हिंसा से मुक्ति के लिए यह एक साफ़ सुथरा मार्ग लगा होगा  अपने काम में समस्या को बढ़ने न देना  भी  तो समाधान का एक आसान  सरल और  सर्वसुलभ  रास्ता है !  उस कनेडियन पुलिस के एक वाक्य  की  प्रतिक्रियास्वरूप उस कॉलेज की  लड़कियों ने  एक स्लट मार्च ही निकाल दिया !  स्लट शब्द का हिंदी अर्थ तो बेशरम, बेहया और उससे भी ज्यादा भयावह  वेश्या है ! कहने की ज़रुरत नहीं है जाहिर ही  है कि ये सारे शब्द स्त्रियों के लिए  प्रयुक्त हुए हैं और होते रहे हैं !

 इस तरह स्लट मार्च  तीखी अपमानजनक परिस्थितियों  के दौर से गुज़र जाने के बाद बर्फ को पिघला देनेवाली प्रतिक्रिया स्वरुप  आया हुआ शब्द  है!
              दिल्ली में जहाँ शिक्षा है, विकास के रास्ते  है, भविष्य की संभावनाएं हैं, .. जहाँ लडके और लड़कियां एक स्तर पर सक्रिय सहयोगी  हैं, जहाँ लाखों की तादाद में स्त्रियाँ उच्च पदों पर बैठी अपनी बुद्धि- कौशल ,अपने शारीरिक , मानसिक सौन्दर्य  अपनी  बुद्धिमत्ता और प्रतिभा   के  जलवे बिखेर रहीं हैं वे  खुद को कहीँ भी किसी भी मायने में कमतर  साबित नहीं होने दे  रहीं हैं वहाँ यानि देश की राजधानी  में उनके साथ प्रतिदिन  बलात्कार चलती गाड़ियों में उन्हें खींच लेना और तो और गैंग- रेप करना, कभी उनके अश्लील म म स बनाकर ब्लैकमेलिंग के ज़रिये  देह -व्यापार में उनको शामिल करना आदि घटनाएं बेहद  बेशर्मी के साथ अंजाम दी जाती हैं !


  स्त्री की  देह  से जबर्दस्ती  दैहिक रिश्ता कायम करना, उनके कपडे फाड़ देना .. भरी हुई यात्री बस में या औटो रिक्शा में  उनके नितम्ब उनके वक्ष और उनकी जाँघों का स्पर्श करते रहना, भीड़ भरी जगहों पर मौका पाकर उनके कान में धीरे से अश्लील शब्द कह देना  यह सब आम घटनाएँ हैं जो हर पल स्त्री का अपमान तो करती ही रहतीं हैं  उसकी अस्मिता को भी 

 दो कौड़ी का साबित करती  हैं  ! यह सब कुछ क्या  है? यह तथाकथित अभिजात्य कहा जाने वाला सभ्य  समाज, एलीट वर्ग  आखिर कितना फूहड़ हों गया है ?
                      क्या करे स्त्री जिससे  कि वह  बलात्कार और छेड़छाड़ और अन्य दूसरे प्रकार की हिंसाओं से  रौंदी न जाए ! क्या विलुप्त हों जाए या कहीं जाकर  छुप जाए  ?  इन  उत्पीड़नों का  यह कोई समाधान तो नहीं  है परिणामस्वरूप  अब लड़कियाँ  तीखी प्रतिक्रिया के लिए तैयार हैं . उसी के  फलस्वरूप  ३१ जुलाई को जंतर मंतर से बेशर्म मार्च निकलेगा . इसकी परिणति क्या होगी कितना सुधरेगा यह समाज क्या सुधरेगा भी? .. यह सब कुछ तो आगे  बहस का विषय है पर हाँ औरते एक जुट तो होंगी ही !  वे तो या बँटी हुई या बांटीं हुई  हैं! कहीं माँ तो कहीं बेटी  कहीं पत्नी तो कहीं प्रेमिका और  कहीं बहन बन कर ! वे सिर्फ स्त्री बनकर कब होती हैं?कब  उनको अपने स्वतन्त्र अस्तित्व की जांच- पड़ताल  का मौका मिलता है!  उनकी असुरक्षा और  दहशत से भरे अनेकों ऊबड़ खाबड़ लम्बे   रास्ते कब ख़त्म होंगे ?  समूह में एक शक्ति  होती है फिर खुले आम खुद को बेशर्म कह देना भी स्त्री के तथाकथित आकाओं के सिर पर गाज गिरने जैसा ही है ! वे लोग कुछ सोचें जो पबों से और पार्कों से लड़कियों को खींच खींचकर बाहर निकालते हैं और अभद्रता को अपना मौलिक अधिकार मानते हैं जो स्त्रियों  के लिए रोबीली नियमावलियां बनाते हैं  !  यह बेशर्मी, यह आग बेहद जरूरी हों गई  है ! इस बात पर फैज़ का एक शेर है-   यही बहुत है के सालिम है दिल का पैराहन                                                                                                ये चाक -चाक गरेबान बेरफू ही सही!
 कुछ नहीं तो कम से कम इतना तो हों सकेगा कि  नासूरों से निकलकर  कुछ दर्द  बाहर आयेंगे ! कुछ आहें बयां तो  होंगी ! 
प्रज्ञा पांडे  

रविवार, 4 जुलाई 2010

स्त्री- देह का सच

स्त्री की यादों में  बहुत कुछ ऐसा होता है जो उसके  मन को बेधता है ! .. स्त्री देह  ऐसी है कि मात्र १३- १४ वर्ष की उम्र आते आते ही  प्रश्न खड़े लगती है .प्रश्न चौराहों से होते जाते हैं .. लोगों के सवाल और सवाल बनती  देह कुछ इस तरह उलझते हैं कि  ताजिंदगी उनके जवाब संजीदा नहीं होने पाते .स्त्री देह के उभार पुरुष को उसके प्रति लोलुप करते हैं .और तथाकथित  मर्यादाएं मय साक्ष्य के झूठ बोलती हैं देह न्यायलय में  ही नंगी कर दी जाती है .स्त्री भ्रमाकुल हों उठती है ! .देह का सच, स्त्री का सच और पुरुष का सच, स्त्री इन्हीं तीनों से बनती जाती है !.उसकी तहों में अँधेरे तहखाने तो होते ही  हैं उसकी  सतरंगी दुनिया  भी  वहीँ कहीं बसी होती है लेकिन  उसकी देह कभी  उसको सुख की नींद सोने नहीं देती है !
                    इसमें कोई संदेह नहीं कि .उसकी देह की व्यवस्था  अदभुत है  और यही उसके दुःख का कारण  भी है .क्या  स्त्री मुक्त होती  यदि  वह गर्भ की   संरचना से  मुक्त होती ?क्या  वह भी बेहद सामान्य और सहज होती ?लेकिन  गर्भ धारण करने की  क्षमता जहाँ उसको विलक्षण बनाती  है  वही शायद    समस्या का मुख्य  कारण भी   है ! स्त्री की अंतर्चेतना में  उसकी देह  सतत हावी रहती  है.! विज्ञान के आविष्कारों  के चरम पर पहुँच जाने  के बाद भी क्या इंसान अपनी  आदिम भूख से परे नहीं जा पाया ? और  कुदुरती तौर पर स्वार्थी अत्याचारी और संकीर्ण रह गया ? वह वक़्त कब आएगा जब स्त्री अपनी  देह के आडम्बर से मुक्त हों जायेगी और खुले मैदानों में पुरुष का हाथ पकड़ कर उसकी देह की लय से अपनी देह की झंकार मिलाती उस पार की घास  छू पाएगी ? या पुरुष की तरह उसे भी निरंकुश दुनिया बसानी होगी ?    

सोमवार, 28 जून 2010

अब भी ...धरती पर इतना अँधेरा क्यों है?





देवा से करीब १५ किलोमीटर दूर  पतली   पगडंडियों और हरे बागों वाले , समतल खेतों में  लहलहाती फसलों वाले , लिपे- पुते चिकने मिटटी के बने  खपरैल की ढलवां  छतों वाले   घरों से लदे फंदे एक  गावं में मैं  आज अलस्सुबह   खपरैल खरीदने पहुँच गयी ! !खपरैल की छतों वाले घर की एक  बड़ी खूबी यह है कि वे गर्मियों में बेहद ठंठे होते हैं और जाड़ों में उतने  ही   गुनगुने होते हैं   !  मैं  खपरैल क़ी यह  छत शहर के ताप को कुछ कम करने के  लिए एक मिटटी का कमरा बनवाकर उसपर  डालना चाहती  थी  बस यही तलाश मुझे  वहाँ ले गयी ....  !निचाट गावं में कुम्हारों की कोई कमी नहीं  थी पर चूंकि अब लोग सुन्दरता की दृष्टि से  सीमेंट के खपरैल इस्तेमाल करने लगे हैं मिटटी के  खपरैल पाना एक मुश्किल मुहीम थी ! उस गावं में भटकते हुए मैं  एक छोटे से कच्चे घर के सामने जा  खडी  हुई   ...वहाँ एक २०- २२ साल की  बहुत आकर्षक युवती मिटटी से अलमुनियम की थालियाँ   साफ़ कर रही थी .सांवली छरहरी कमनीय   ..मैं  उसका सौन्दर्य देखती  रह गयी  ...बोलीवुड क़ी किसी भी हिरोइन से कम आकर्षण उसमें नहीं था ...सिवाय सहज ग्रामीण   लज्जा के जो उसकी  खिलती दंतपंक्ति से भी टपक रही थी ..कालिदास क़ी पंक्तियाँ बरबस ही याद आ गयीं ....जो उन्होंने मेघदूत क़ी  यक्षिणी के लिए लिखी थी ....तन्वी श्यामा शिखर दशना पक्व बिम्बाधारोष्ठी ...२० -२२ साल क़ी उम्र में उसके तीन बच्चे थे चौथे क़ी संभावना उसने भगवान् पर पर छोड़ रखी थी!. वह वहीँ  बैठकर  अपने  तीन साल के बच्चे को अपने स्तन खोलकर दूध  पिलाने लगी तभी मैंने समझ लिया    कि चौथे  बच्चे के बाद ही इसके सहज सौन्दर्य का रस चला जायेगा और यह २२ से ३२ क़ी हों जाएगी .!  पहले उसने अपना नाम मिट्ठू की अम्मा बताया था फिर बहुत पूछने पर.. बहुत  लजाते हुए ..कन्याकुमारी बताया  !
 चौथा बच्चा न करना मैं उसको यह राय देकर चलने को हुई   ..तब तक उसका पति भी आ गया जिसने एक दूसरे कुम्हार का पता मुझे दे दिया ....मैं यह सोचती  हुई उसका भोला निश्छल  रूप अपनी आँखों में लेकर  चली आई ... .. कि शुक्र है  कि बाज़ार अभी  इस गावं तक नहीं आया है लेकिन..और  भी तो बहुत कुछ है जो उस गावं तक नहीं पहुंचा है कन्याकुमारी  के सौन्दर्य को आत्मचेतना का उजाला   कब .. और कैसे मिलेगा ? इंसान तो चाँद पर ज़मीन खरीदने जा रहा है ..अब भी ...धरती पर इतना अँधेरा क्यों है? 

सोमवार, 21 जून 2010

स्त्री को इस तरह भागना क्यों पड़ता है ?

सन १९८३ की बात है .उसकी उम्र थी २० या हद से हद २१ वर्ष .भरी  हुई देहयष्टि और भरपूर आकर्षण की कही कोई कमी नहीं.! उसका नाम बबिता  था! दो साल विवाह को हुए थे ! तब  मायके में रह रही थी! वह  किसी खौफनाक रात के  सन्नाटे में  अपनी ससुराल  से भाग आई थी  .यह सब कुछ  उसने खुद ही एक दिन बताया था .यूँ तो  गौर करने पर उसकी पानीदार  आँखें ऐसा  ही  कुछ बयां भी  करती थीं .कई बार उसको उसकी सास के जान से मारने की कोशिशों ने उसे  इस कदर खौफ में डाल दिया था  कि वह सारी नसीहतें सारी ज़जीरें सारी  मर्यादाएं औए सारे संस्कार तहस- नहस कर सिर्फ अपनी जान लेकर भागी थी  .एक  ऐसे घर से भागना  जहाँ के दरवाजों गलियारों से  उससे कोई परिचय नहीं था और  जहाँ वह पहली बार गयी थी  दुस्साहस का काम था ! यदि उसके प्राण उसकी प्रथम प्राथमिकता न होते तो एक  नववधू के लिए रात के सन्नाटे में घर के बाहरी दरवाजों  की  चाभी भाग जाने के लिए  सहेजना कोई आसान काम तो नहीं था...उसको आज भी मेरा मन सलाम करता है ..मैं बार बार सोचती हूँ कि स्त्री और पुरुष की  इस दुनिया में स्त्री को इस तरह भागना क्यों पड़ता है ?