रविवार, 25 दिसंबर 2011

स्त्री की देह भी अपनी नहीं

आज के समय  में  या आज से पहले देह से बाहर स्त्री  का कोई अस्तित्व न था और न है !हाँ ! पत्थर युग में  था !स्त्री तब अपने आदिम गुणों के साथ मौजूद थी .
                       आज की सामजिक जटिलताओं में  हर जगह स्त्री  देह के रूप में ही मिलती है ! निश्चित रूप से समाज के जटिल होने की यह एक बड़ी   वजह  लगती है ! समाज, परिवार, राजनीति, व्यवसाय, नौकरी जहाँ भी स्त्री है वहाँ वह स्वतन्त्र अस्तित्व के रूप में नहीं बल्कि देह के रूप में है ! यदि वह देह के बाहर आकर अपनी ऊर्जा से स्वप्न रचना चाहती है, मर्दवादी व्यस्था को तोड़कर सिर्फ मनुष्य बनती है, आकाश कुसुम तोड़ने के लिए  अपनी शक्ति और सौन्दर्य से जीवन के  ताने बाने रचने का साहस करती है तो रास्ते से हमेशा के लिए हटा दी जाती है यानि मार दी जाती है ! एक नहीं अनेकों बार यही हुआ है, हो रहा है और फिलहाल होते रहने के आसार भी  सारे खतरों के साथ हर  जगह  मौजूद हैं ! स्त्री यदि  खूबसूरत है यानि दैहिक सौन्दर्य के सारे मानदंड(जो पुरुषों द्वारा बनाये गए हैं ) यदि उस पर खरे उतरते हों  और इसके साथ ही  साथ वह स्वप्न भी पाल रही हो और अपने अधिकारों की बात करने लगी हो उसके लिए बनायी गयीं चौहद्दियों को तोड़ने लगी हो  तब तो उसका बचना असंभव है !अपनी देह लिए भागी  भागी  फिरने के अतिरिक्त उसके पास दूसरा कोई  रास्ता नहीं होता है या फिर एक दूसरा रास्ता है यदि  वह मनुष्य होने के अपने दावे को छोड़ दे और  देह के स्तर पर  समझौते करके समाधान पा ले !  रेशा रेशा छीजकर वह ऐसा भी करती है  जो अनिश्चिकालीन और पूर्णतः  असुरक्षित होता है और जिसमें वह सिर्फ देह के रूप में जीवित रहती है ! तब क्या करे वह ! क्या होगा उसके स्वप्नों और उसकी  आकांक्षाओं  का ! उसके मनुष्य योनि में जन्म लेने का !.
                            पुरुषवादी व्यवस्था में वह दूसरी व्यवस्था कैसे रचे.! एक सत्ता के अधीन होते हुए वह दूसरी सत्ता कैसे बनाये ! यहीं से शुरू होता है उसका संघर्ष ! पुरुष के सहारे के बिना वह कुछ कर भी तो नहीं सकती है ! चप्पे चप्पे पर पुरुष है ! यहाँ तक कि  उसके गर्भाशय पर भी पुरुष का ही कब्ज़ा  है ! वही पुरुष जिसने उसको  सिर्फ देह घोषित किया है ! जिसने उसके लिए सोने की भारी-भारी हथकड़ियाँ और बेड़ियाँ बनवायीं, ऊंची  दीवारें बनवायीं और ऐसी वैवाहिक व्यवस्था बनायी   जिसमें उसको अपना सर्वस्व देना है ! बदले में स्त्री को  पाना है उसकी देह और मन पर किसी भी पुरुष का स्वामित्व ! 
क्या यह विमर्श का विषय नहीं  कि बुद्धिमान स्त्री को बुद्धिमान पुरुष की आवश्यकता होती है ! उसे किसी भी पुरुष की आवश्यकता नहीं होती ! विवाह की व्यवस्था  समाज और  देह की व्यवस्था है. यह व्यवस्था किसी भी तरह से स्त्री के पक्ष में नहीं है  !  
                                                     यदि पुरुष सचमुच ईमानदार है तो  देह- बल से युक्त होने के बाद भी क्यों नहीं स्त्री की स्वतंत्रता की आचार संहिता  भी बनाता है  जिसमें वह उसकी देह को और उसके गर्भाशय   को आज़ाद करता है ! क्यों नहीं वह उसको अपने स्वप्न रचने के लिए आज़ाद करता है !  एक ओर तो उसको आधी दुनिया की संज्ञा देता है दूसरी ओर उस आधी आबादी को अपना गुलाम भी बनाता है !तब वह आधी आबादी कहाँ है! कैसे है ! यह सारे सवाल पुरुष से ही पूछने ज़रूरी हैं .इनके जवाब उसे ही देने हैं  क्योंकि स्त्री उसकी देह-बल के कारण गुलाम है ! स्त्री की गुलामी की
सिर्फ इतनी वजह है ! जिसकी लाठी है  उसकी ही  भैंस है  !
                                 स्त्री के प्रेम में एकनिष्ठता होती है जबकि पुरुष एक साथ कई स्त्रियों से सम्बन्ध स्थापित करने में कोई गुरेज नहीं करता है !
                                         स्त्री  के पास भी  बुद्धि, ज्ञान, हौसले, सपने, चाहतें, इच्छाएं, आत्मसम्मान, स्वाभिमान उसकी अपनी अस्मिता और अपनी  निजता के तमाम मायने हैं ! उसकी देह देखने के लिए नहीं है, न ही वह  कोई तमाशा है जिससे  मेले-ठेले में और  भीड़ भरी जगहों पर मनोरजन किया जाए!  वह देह मात्र  है ही नहीं  उसकी देह भी पुरुष-देह की तरह स्वप्नों को रचने का माध्यम  है . इस दुनिया में वह भी प्राकृतिक रूप से  बेहद  शक्ति सम्पन्न एक इकाई है! पुरुष -देह की निजता जिस तरह उसकी है उसी तरहस्त्री की देह की भी  निजता है  ! वह  खिलौना  नहीं है जिसको ललचाई और वासनामय  नज़रों से देखने की  (  नयन सुख   की ) पुरुष को खुली आज़ादी  है ! उसकी जाँघों में भी उतनी ही शिराएँ , हड्डियाँ और खून है जितना कि पुरुष की जाँघों   में है ! बिना उसकी सहमति के सरेआम  उसकी देह को देख कर वासनामय हुआ जाए यह  भी जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है ! यह स्त्री की अस्मिता और उसकी निजता का  हनन तो  है ही पुरुष का भी घोर पतन   है ! कब प्रकृति ने यह कह दिया कि स्त्री को वासना से भर कर देखो !क्या प्रकृति ने यह नहीं कहा कि  स्त्री सदियों से संतति को जन्म देती आ रही  है! नौ माह पेट में उसको रखकर अपना खून और अपनी देह का सत्व देकर   तैयार करती है उसे अपने स्तनों से दूध पिलाती  है ! इस स्त्री की सत्ता को पुरुष स्वीकार ही नहीं करना चाहता है .
                                             कहते हैं गर्भ के दौरान होने वाली विपरीत परिस्थितियों  में भी कन्या भ्रूण के जीवित बचने की संभावना पुरुष भ्रूण की  तुलना में अधिक  होती है ! पुरुष की तुलना में वह धैर्यशील अधिक है  ! सारे गुणों से संपन्न होने   के  बावजूद  स्त्री पुरुष को वासनामय
बजबजहाटों के बीच  योनि का आकार मात्र लगती है ? ऐसा है तो यह  असहनीय और निंदनीय है !  पुरुष का   पौरुष और उसका   शारीरिक बल पशुवत है   यदि वह  रक्षा करना नहीं जानता है  . अपने इस प्रकृति प्रदत्त देह बल का वह  भरपूर दुरुपयोग करता है और स्त्री को मात्र योनि मानकर स्वयं को पशु साबित करने के लिए इस नकली ढोंगी और तथाकथित अभिजात्य समाज में  बौद्धिकता का जामा पहनकर खुद को  पुरुष और मनुष्य कहता है !
                                     इस ब्रह्माण्ड के रहस्यों के ढूँढने में जिस मनुष्य ने प्रकृति का कोना कोना छाना है  ! वही मनुष्य स्त्री को रहस्यमय बनाये रखने  के लिए कितने  कुतर्क गढ़ता है !  बात बात पर अपने तर्कों की दृढ़ता के लिए   बिहारी, कालिदास, और विद्यापति जैसे बड़े बड़े कवियों के  नामों का हवाला देना और यह कहना कि   उन्होंने स्त्री की देह पर कसीदे काढ़े हैं! यह तो मूढ़ मति का  परिचायक होने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं ! 
                                                     कालिदास की रचनाओं में प्रेम और सौन्दर्य है ! ऐसा ही बिहारी और विद्यापति या अन्य किसी श्रृंगारिक रचना के  साथ है ! साहित्य क्या सौन्दर्य के बिना रचा जा सकता है !साहित्य ही नहीं क्या कुछ भी  प्रेम के बिना रचा जा सकता है ! जिस तरह नवजात शिशु, यह धरती, यह आकाश और पृथ्वी सभी  रंग, सारे पक्षी, पर्वत,  और नदियाँ सुन्दर हैं जिस तरह इन्द्रधनुष और बादल सुन्दर हैं उसी तरह स्त्री भी प्रकृति की अन्यतम  कृति है! पुरुष का  देह-सौष्ठव भी प्रकृति की ही देन है !ऐसी स्थिति में एक दूसरे का भरपूर सम्मान करना ही न्यायोचित है .
                                              मनुष्य का स्वभाव ही प्रेम करने का है वह हर सुन्दर चीज़ से प्रेम करता है ! खजुराहो प्रेम और सौन्दर्य का प्रतीक है! हमारी तो  संस्कृति ही सौन्दर्य और प्रेम पर आधारित है ! वासना  मनुष्य को  पशु में बदल देती है ! अपने शिकार पर झपटते  हुए उसकी आँखों में  भूख और  वासना होती है !
                          आप तब तक स्त्री की देह को देखने का लोभ बनाए रहेंगे   जब तक  वह सात पर्दों में होगी ! उसके चेहरे पर जब नकाब होती है तब उसका नकाब उलट देने की  आपकी आदिम  इच्छा असहनीय होती है ! .उसकी जांघें और उसकी पीठ जब तक ढकी रहेगी तब तक  वासनामय दृष्टि को रोकना कठिन होगा ! यह सच है !
                 स्त्री और पुरुष जिस दिन साथ चलेंगे ..उस दिन न  तो देह की बात बचेगी न ही मुक्ति की!तब शायद  ये ज़रूर हो पाये कि  स्त्री अपने  गर्भ और देह की निजता पर स्वयं  फैसले कर सके !
                सत्ता कभी अच्छी नहीं होती चाहे वह स्त्री की ही क्यों न हो ! सत्ता सपनों को मारती है !मातृसत्ता में भी वही खामियां होंगी जो पुरुष सत्ता में हैं  !  अंततः यह समाज नैतिकता और ईमानदारी  की कसौटी पर ही कसा जाएगा ! क्यों न पूर्ण मनुष्य बनने का प्रयास किया  जाए और स्त्री को भी मनुष्य की श्रेणी में रखा जाए  !      
                           कलुषित मानसिकता के दंभ में उलझी पुरुषवादी दृष्टि को सदा के लिए समाप्त करके ही समाज रचनात्मक हो सकेगा !  स्त्री को देह मानने का  संस्कार छोड़ देना ही उचित है ! शायद यह वक़्त बदले और स्त्री अपनी देह और अपने गर्भ  पर अपने वाजिब  अधिकारों को  पा सके !

प्रज्ञा पाण्डेय

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

कुछ आहें बयां तो होंगी !

दर्द-ए-बयां है ये 
 आधी नींद से  जागने के बाद सो पाना असंभव हों जाता है बल्कि उचटी हुई नींद तभी चैन लेती है जब वह पूरी तरह से जाग ले और सब कुछ व्यवस्थित कर ले  क्योंकि नींद कभी बिना वजह नहीं उचटती ! सदियों से आधी  नींद  सोयी स्त्रियाँ अब उचटी हुई नींद से धीरे धीरे ही सही  बाहर आ रही हैं !
                    यदि पूछा जाए कि दिल्ली में होंने वाले ३१जुलाई  के बेशर्म मार्च में क्या आप भी भाग लेने जायेंगे ?
             तो क्या जवाब होगा आपका हाँ या नहीं ? आपको मालूम है भी है, ये बेशरम मार्च  क्या है?
दिल्ली में ३१ जुलाई  को कुछ समय पहले कनाडा में हुए स्लट मार्च की तर्ज़ पर वहाँ की स्त्रियों ने बेशर्म मार्च निकालने का फैसला लिया है  जो जंतर मंतर से शुरू होकर ...तक जाएगा ! उसमें भाग लेने वाली लड़कियां व्  स्त्रियाँ साड़ी  से लेकर शोर्ट्स तक पहन सकतीं हैंया फिर जो भी सामान्य कपडे वे रोज़मर्रा के जीवन में पहनती हैं ! बेशर्म मार्च में किसी तरह का अश्लील या अशिष्ट ड्रेस पहनने का कोई अर्थ बिलकुल नहीं है बल्कि यह मार्च दुखती रग का एक दर्दे बयान है  ..  . 

हुआ यूँ कि कनाडा में किसी लड़की के खुले कपड़ों पर आपत्ति जताते हुए किसी पुलिस वाले ने उसे ढंग से कपडे पहननें  की सलाह दे डाली .बिना मांगे राय देना तो वैसे भी गलत होता है   ..पुलिसवाले को अपनी अल्प समझ भर स्त्रियों के साथ होने वाली हिंसा से मुक्ति के लिए यह एक साफ़ सुथरा मार्ग लगा होगा  अपने काम में समस्या को बढ़ने न देना  भी  तो समाधान का एक आसान  सरल और  सर्वसुलभ  रास्ता है !  उस कनेडियन पुलिस के एक वाक्य  की  प्रतिक्रियास्वरूप उस कॉलेज की  लड़कियों ने  एक स्लट मार्च ही निकाल दिया !  स्लट शब्द का हिंदी अर्थ तो बेशरम, बेहया और उससे भी ज्यादा भयावह  वेश्या है ! कहने की ज़रुरत नहीं है जाहिर ही  है कि ये सारे शब्द स्त्रियों के लिए  प्रयुक्त हुए हैं और होते रहे हैं !

 इस तरह स्लट मार्च  तीखी अपमानजनक परिस्थितियों  के दौर से गुज़र जाने के बाद बर्फ को पिघला देनेवाली प्रतिक्रिया स्वरुप  आया हुआ शब्द  है!
              दिल्ली में जहाँ शिक्षा है, विकास के रास्ते  है, भविष्य की संभावनाएं हैं, .. जहाँ लडके और लड़कियां एक स्तर पर सक्रिय सहयोगी  हैं, जहाँ लाखों की तादाद में स्त्रियाँ उच्च पदों पर बैठी अपनी बुद्धि- कौशल ,अपने शारीरिक , मानसिक सौन्दर्य  अपनी  बुद्धिमत्ता और प्रतिभा   के  जलवे बिखेर रहीं हैं वे  खुद को कहीँ भी किसी भी मायने में कमतर  साबित नहीं होने दे  रहीं हैं वहाँ यानि देश की राजधानी  में उनके साथ प्रतिदिन  बलात्कार चलती गाड़ियों में उन्हें खींच लेना और तो और गैंग- रेप करना, कभी उनके अश्लील म म स बनाकर ब्लैकमेलिंग के ज़रिये  देह -व्यापार में उनको शामिल करना आदि घटनाएं बेहद  बेशर्मी के साथ अंजाम दी जाती हैं !


  स्त्री की  देह  से जबर्दस्ती  दैहिक रिश्ता कायम करना, उनके कपडे फाड़ देना .. भरी हुई यात्री बस में या औटो रिक्शा में  उनके नितम्ब उनके वक्ष और उनकी जाँघों का स्पर्श करते रहना, भीड़ भरी जगहों पर मौका पाकर उनके कान में धीरे से अश्लील शब्द कह देना  यह सब आम घटनाएँ हैं जो हर पल स्त्री का अपमान तो करती ही रहतीं हैं  उसकी अस्मिता को भी 

 दो कौड़ी का साबित करती  हैं  ! यह सब कुछ क्या  है? यह तथाकथित अभिजात्य कहा जाने वाला सभ्य  समाज, एलीट वर्ग  आखिर कितना फूहड़ हों गया है ?
                      क्या करे स्त्री जिससे  कि वह  बलात्कार और छेड़छाड़ और अन्य दूसरे प्रकार की हिंसाओं से  रौंदी न जाए ! क्या विलुप्त हों जाए या कहीं जाकर  छुप जाए  ?  इन  उत्पीड़नों का  यह कोई समाधान तो नहीं  है परिणामस्वरूप  अब लड़कियाँ  तीखी प्रतिक्रिया के लिए तैयार हैं . उसी के  फलस्वरूप  ३१ जुलाई को जंतर मंतर से बेशर्म मार्च निकलेगा . इसकी परिणति क्या होगी कितना सुधरेगा यह समाज क्या सुधरेगा भी? .. यह सब कुछ तो आगे  बहस का विषय है पर हाँ औरते एक जुट तो होंगी ही !  वे तो या बँटी हुई या बांटीं हुई  हैं! कहीं माँ तो कहीं बेटी  कहीं पत्नी तो कहीं प्रेमिका और  कहीं बहन बन कर ! वे सिर्फ स्त्री बनकर कब होती हैं?कब  उनको अपने स्वतन्त्र अस्तित्व की जांच- पड़ताल  का मौका मिलता है!  उनकी असुरक्षा और  दहशत से भरे अनेकों ऊबड़ खाबड़ लम्बे   रास्ते कब ख़त्म होंगे ?  समूह में एक शक्ति  होती है फिर खुले आम खुद को बेशर्म कह देना भी स्त्री के तथाकथित आकाओं के सिर पर गाज गिरने जैसा ही है ! वे लोग कुछ सोचें जो पबों से और पार्कों से लड़कियों को खींच खींचकर बाहर निकालते हैं और अभद्रता को अपना मौलिक अधिकार मानते हैं जो स्त्रियों  के लिए रोबीली नियमावलियां बनाते हैं  !  यह बेशर्मी, यह आग बेहद जरूरी हों गई  है ! इस बात पर फैज़ का एक शेर है-   यही बहुत है के सालिम है दिल का पैराहन                                                                                                ये चाक -चाक गरेबान बेरफू ही सही!
 कुछ नहीं तो कम से कम इतना तो हों सकेगा कि  नासूरों से निकलकर  कुछ दर्द  बाहर आयेंगे ! कुछ आहें बयां तो  होंगी ! 
प्रज्ञा पांडे  

ऑफ व्हाइट                              उस ऑफ व्हाईट शाल को उठाकर सीने से लगा लिया है मैंने .   मुझे   वह     मिल गयी है जो उस दिन धू ...